अजित पवार का बिहार दांव, जो सफल होता तो एनसीपी बनती राष्ट्रीय सियासत की बड़ी ताकत
पटना।राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख अजित पवार के आकस्मिक निधन के साथ ही भारतीय राजनीति के एक ऐसे अध्याय पर विराम लग गया, जिसमें बड़े राजनीतिक प्रयोगों और अधूरे सपनों की छाया रही। बिहार की राजनीति में एनसीपी को स्थापित करने की उनकी कोशिश भी ऐसा ही एक प्रयोग थी, जो अगर सफल होता तो पार्टी को भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय ताकतों की कतार में खड़ा कर सकता था।
बिहार में एनसीपी का राजनीतिक सफर कभी भी मजबूत नहीं रहा। पार्टी के ढाई दशक से अधिक के अस्तित्व में वर्ष 2005 ही वह दौर रहा, जिसे एनसीपी के लिए ‘गोल्डन ईयर’ माना जाता है। इसके बाद बिहार में पार्टी लगातार हाशिये पर जाती चली गई।
शुरुआती पकड़, फिर ढलान
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 1999 में कांग्रेस से अलग होकर बनी एनसीपी की बिहार में शुरुआत अपेक्षाकृत बेहतर रही थी। सीमांचल क्षेत्र—कटिहार और पूर्णिया—में पार्टी की मौजूदगी...









