
बिहार की राजनीति में ‘जंगलराज’ केवल एक चुनावी नारा नहीं रहा, बल्कि वह दौर रहा जिसने राज्य की कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक क्षमता और शासन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। 1990 के बाद राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के शासनकाल में बढ़ते अपराध, जातीय नरसंहार, अपहरण उद्योग और व्यापक भ्रष्टाचार ने बिहार को राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी के शिखर पर पहुंचा दिया। इन्हीं परिस्थितियों ने अंततः सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार की और नीतीश कुमार के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।
दिलचस्प तथ्य यह है कि ‘जंगलराज’ शब्द किसी राजनीतिक दल की उपज नहीं था। पहली बार इस शब्द का प्रयोग पटना हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने राज्य सरकार की बदइंतजामी पर टिप्पणी करते हुए किया था। यह टिप्पणी किसी हत्या या बलात्कार जैसे गंभीर आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान नहीं, बल्कि राजधानी पटना में मॉनसून के दौरान जलजमाव और अव्यवस्थित सड़कों को लेकर की गई थी। बाद में यही शब्द राजद शासनकाल की हर आपराधिक और प्रशासनिक विफलता का पर्याय बन गया।
जहानाबाद जेल ब्रेक: प्रशासनिक अक्षमता की भयावह मिसाल
13 नवंबर 2005 की शाम बिहार के इतिहास में काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई। नक्सलियों ने जहानाबाद जेल पर सुनियोजित हमला कर देश के सबसे बड़े जेल ब्रेक कांड को अंजाम दिया। जेल सुरक्षा बलों से अधिक संख्या में मौजूद नक्सलियों ने आसानी से जेल पर कब्जा कर लिया।
नक्सली जेल में दाखिल हुए, अपने साथियों की पहचान की और लगभग 300 से अधिक कैदियों को छुड़ा ले गए। इस दौरान रणवीर सेना के दो प्रमुख नेताओं—बड़े शर्मा और विश्वेश्वर राय—की जेल के भीतर ही हत्या कर दी गई। हमले में 16 राइफलें लूट ली गईं और 12 लोगों की जान चली गई।
उस समय राज्य में राष्ट्रपति शासन था और यह घटना प्रशासनिक कमजोरी की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आई। इस कांड को खुले तौर पर ‘जंगलराज’ की परिणति बताया गया।
नरसंहारों से दहला बिहार
राजद शासनकाल में जातीय हिंसा अपने चरम पर पहुंच गई थी। इन घटनाओं ने बिहार की छवि देश-विदेश में गंभीर रूप से धूमिल की।
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बारा नरसंहार (1992): गया जिले के बारा गांव में 35 लोगों की गला रेतकर हत्या।
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बथानी टोला नरसंहार (1996): भोजपुर जिले में दलित, पिछड़े और मुस्लिम समुदाय के 22 लोगों की हत्या।
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लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (1997): 58 दलितों की निर्मम हत्या।
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शंकर बिगहा नरसंहार (1999): जहानाबाद में 22 दलितों की हत्या।
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मियांपुर नरसंहार (2000): औरंगाबाद में 35 दलितों की जान गई।
इन नरसंहारों ने सामाजिक ताने-बाने को गहरे जख्म दिए और सरकार की निष्क्रियता पर सवाल खड़े किए।
अपहरण बना उद्योग
राजद शासन में अपहरण एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका था। छोटे-बड़े सैकड़ों अपहरण मामलों में सबसे चर्चित गोलू और किसलय अपहरण कांड रहे।
वर्ष 2001 के गोलू अपहरण कांड ने पूरे राज्य को झकझोर दिया। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा इन मामलों का सार्वजनिक मंचों से जिक्र किए जाने पर जनभावनाएं फिर उभर आईं। अपहरण पीड़ित परिवारों का दर्द उस दौर की असहनीय सच्चाई को उजागर करता रहा।
अपराधियों का गढ़ बनता बिहार
राजद के 15 वर्षों के शासनकाल में बिहार अपराधियों की शरणस्थली बन गया था। शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, आनंद मोहन, सूरजभान सिंह, मुन्ना शुक्ला, राजन तिवारी जैसे नाम खुलेआम आपराधिक गतिविधियों से जुड़े रहे।
इस दौर की सबसे सनसनीखेज घटना आईजीआईएमएस अस्पताल में घुसकर मंत्री ब्रिज बिहारी की हत्या थी, जिसने कानून-व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया।
चारा घोटाला: सत्ता पतन की अंतिम कील
राजद शासन के पतन की सबसे बड़ी वजह बना चारा घोटाला। लगभग 950 करोड़ रुपये के इस घोटाले में फर्जी बिलों के जरिए सरकारी खजाने को लूटा गया।
मार्च 1996 में पटना हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपी। जांच में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम सामने आए। कई दोषियों को सजा हुई, लालू यादव को भी जेल जाना पड़ा।
चारा घोटाला राजद की राजनीतिक ताबूत की अंतिम कील साबित हुआ।
सत्ता परिवर्तन और ‘सुशासन’ की शुरुआत
राजद शासनकाल की इन्हीं घटनाओं से जनता में व्यापक असंतोष पनपा। वर्ष 2005 में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। ‘जंगलराज’ के खिलाफ ‘सुशासन’ का नारा बुलंद हुआ और बिहार की राजनीति ने नया मोड़ लिया।