
भोपाल।
मेडिकल शिक्षा व्यवस्था की पवित्रता से खिलवाड़ करने वाले एक आरोपी को आखिरकार कानून ने उसके अंजाम तक पहुंचा दिया। फर्जी मूल निवासी (आवासीय) प्रमाण पत्र के जरिए मेडिकल की सीट हथियाने वाले डॉक्टर को 15 साल बाद जिला अदालत से कठोर सजा मिली है। राजधानी भोपाल की अदालत ने इस बहुचर्चित मामले में आरोपी को दोषी करार देते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।
यह फैसला 23वें अपर सत्र न्यायाधीश अतुल सक्सेना की अदालत ने सुनाया।
राज्य कोटे की सीट पर किया था कब्जा
अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि वर्ष 2010 की पीएमटी परीक्षा में सुनील सोनकर ने परीक्षा तो उत्तीर्ण कर ली थी, लेकिन मध्यप्रदेश राज्य कोटे का अनुचित लाभ लेने के उद्देश्य से फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र तैयार कराया।
प्रवेश प्रक्रिया के दौरान इसी कूटरचित दस्तावेज को प्रस्तुत कर उसने एक वास्तविक और योग्य अभ्यर्थी की मेडिकल सीट छीन ली, जिससे पूरे चयन तंत्र की निष्पक्षता पर आघात पहुंचा।
STF जांच में खुला फर्जीवाड़ा
मामले की शिकायत मिलने पर एसटीएफ थाना भोपाल ने विस्तृत जांच की। जांच के दौरान यह पुष्टि हुई कि आरोपी द्वारा प्रस्तुत मूल निवासी प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी और कूटरचित था।
विशेष लोक अभियोजक अकील खान और सुधाविजय सिंह भदौरिया ने अदालत के समक्ष ठोस साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए, जिनके आधार पर न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत दोषी माना।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार की धोखाधड़ी न केवल कानून के साथ अपराध है, बल्कि समाज और चिकित्सा व्यवस्था के विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा के क्षेत्र में जालसाजी करने वालों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी न्यायहित में नहीं है।
व्यापमं घोटाले की कड़ी
गौरतलब है कि उस समय व्यापमं के अंतर्गत आयोजित परीक्षाओं में व्यापक अनियमितताएं सामने आई थीं। कई मामलों में अब तक आरोपियों को सजा हो चुकी है, अनेक की नौकरियां जा चुकी हैं और कई प्रकरण आज भी न्यायालय में लंबित हैं।
अब फर्जी आवासीय प्रमाण पत्र के सहारे मेडिकल सीट हासिल करने वाले आरोपी को जेल भेजे जाने से यह स्पष्ट संदेश गया है कि चाहे फैसला देर से आए, लेकिन न्याय से बचा नहीं जा सकता।