
छतरपुर।
संघर्ष जब संकल्प बन जाए और धैर्य जब जुनून में बदल जाए, तब सफलता इतिहास रचती है। छतरपुर जिले के लवकुश नगर की मयंका चौरसिया ने ऐसा ही इतिहास रचा है। लगातार 8 बार असफल होने के बावजूद हार न मानने वाली मयंका ने 9वें प्रयास में एमपीपीएससी परीक्षा पास कर डीएसपी का पद हासिल किया, और अपनी कहानी को लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बना दिया।
मयंका की यह यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं — जहां असफलता बार-बार रास्ता रोकती रही, लेकिन हौसले हर बार उससे ऊंचे साबित हुए।
‘वर्दी पहले, शादी बाद में’ — लिया था भीष्म संकल्प
मयंका चौरसिया ने यह संकल्प लिया था कि जब तक कंधों पर सितारे नहीं लगेंगे, तब तक विवाह नहीं करेंगी।
परिवार, समाज और रिश्तेदारों के दबाव के बावजूद उन्होंने अपने सपनों से समझौता नहीं किया। यही दृढ़ निश्चय बाद में उनकी पहचान बना — जिसे लोग आज ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ के नाम से जानते हैं।
2023 में हासिल की 10वीं रैंक
मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) 2023 की परीक्षा में मयंका ने प्रदेश में 10वीं रैंक प्राप्त की। यह उपलब्धि उनके लिए सिर्फ एक चयन नहीं, बल्कि 9 वर्षों के धैर्य, तपस्या और आत्मविश्वास की जीत थी।
इंजीनियरिंग के बाद चुना सिविल सर्विस का रास्ता
मयंका ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लवकुश नगर से पूरी की। इसके बाद उन्होंने भोपाल के बंसल कॉलेज से बीटेक किया। इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद वर्ष 2016 में उन्होंने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू की, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि यह सफर पूरे नौ वर्षों तक चलेगा।
इंटरव्यू तक पहुंचीं, फिर भी चयन नहीं
तैयारी के शुरुआती वर्षों में मयंका ने प्रीलिम्स परीक्षा सफलतापूर्वक पास की, लेकिन मेन्स में सफलता नहीं मिली।
2019 और 2020 में वे इंटरव्यू तक पहुंचीं, लेकिन अंतिम सूची में नाम नहीं आ सका।
2021 में मेन्स तक पहुंचने के बाद स्वास्थ्य संबंधी कारणों से परीक्षा बीच में छोड़नी पड़ी, जो उनके जीवन का सबसे कठिन दौर रहा।
बिना कोचिंग, आत्मविश्वास बना सबसे बड़ा हथियार
इतनी चुनौतियों के बावजूद मयंका ने हार नहीं मानी। स्वास्थ्य सुधरते ही उन्होंने दोबारा खुद को तैयारी में झोंक दिया।
उन्होंने किसी भी कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया, बल्कि इंदौर में रहकर स्व-अध्ययन के दम पर यह मुकाम हासिल किया।
उनके भाई शिवाकर चौरसिया बताते हैं कि मयंका का लक्ष्य शुरू से ही स्पष्ट था — सिविल सर्विस ही उनका सपना था।
9 साल का संघर्ष, एक दिन में बदली किस्मत
आखिरकार वह दिन आया, जब 9 वर्षों की तपस्या रंग लाई और मयंका को डीएसपी की वर्दी मिली।
उनकी सफलता यह साबित करती है कि असफलता अंत नहीं होती, बल्कि सफलता की तैयारी होती है।
आज मयंका चौरसिया सिर्फ एक डीएसपी नहीं हैं, बल्कि वे हर उस युवा की उम्मीद बन चुकी हैं जो बार-बार गिरने के बावजूद फिर खड़ा होने का साहस रखता है।