
नई दिल्ली: आज 21 फरवरी को हम याद करते हैं हिंदी सिनेमा की जानी-मानी अदाकारा नूतन को, जिनका नाम सादगी, खूबसूरती और बेहतरीन अभिनय के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शुरुआत में खुद उनके परिवार वाले भी उन्हें उनकी सुंदरता के लिए कम आंकते थे और उन्हें बदसूरत कहने लगे थे?
साल 1958 में रिलीज हुई फिल्म ‘आखिरी दांव’ के गाने ‘तुझे क्या सुनाऊं मैं दिलरुबा’ में नूतन की मासूमियत ने दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाई। हालांकि, बचपन से ही नूतन अपने रंग-रूप को लेकर असहज रहती थीं।
मां ने समझाया, मेहनत से निखारा
नूतन की मां शोभना सामर्थ ने अपनी बेटी का हौसला बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब नूतन को बचपन में उनकी मां की सहेली ने कहा था, “तुम्हारी बेटी तुम्हारी जितनी खूबसूरत नहीं है,” तो यह बात नूतन को बहुत बुरी लगी। लेकिन मां ने समझाया, “इसे तारीफ की तरह लो, जैसे-जैसे तुम बड़ी होगी, तुम्हारा रंग और रूप दोनों निखरेंगे।”
शोभना सामर्थ ने नूतन को पढ़ाई के लिए विदेश भेजा, उनका वजन कम करवाया और फिल्मों में स्थापित करने के लिए उन्हें पूरी तैयारी कराई। नूतन ने बतौर बाल कलाकार ‘नल दमयन्ती’ से अपना डेब्यू किया और इसके बाद ‘नगीना’ जैसी फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखाई। उनकी सफलता देखकर रिश्तेदारों के भी सुर बदल गए और वे गर्व महसूस करने लगे।
अनारकली का रोल करने से किया इंकार
महज 14 साल की उम्र में नूतन को फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में अनारकली का रोल ऑफर हुआ था। लेकिन आत्मविश्वास की कमी के कारण उन्होंने इस रोल को ठुकरा दिया। नूतन ने एक्टिंग की हर कला सीखने के लिए विदेश में पढ़ाई की और अपनी इंग्लिश को भी सुधार लिया।
साल 1955 में फिल्म ‘सीमा’ से वे हिंदी सिनेमा में वापसी की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। नूतन ने अपने दम पर यह साबित कर दिया कि मेहनत, आत्मविश्वास और मां का सहारा किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है।
