Wednesday, January 28

भागीरथपुरा में दूषित पानी से 16 मौतें स्वीकार, 4 मामलों पर संदेह हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को बताया ‘आई-वॉश’, ‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द पर जताई कड़ी आपत्ति

इंदौर।
भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में मंगलवार को इंदौर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जनहित याचिकाओं पर करीब ढाई घंटे चली सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट को लेकर न्यायालय ने तीखी टिप्पणी की और उसे महज़ “आई-वॉश” करार दिया।

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हाईकोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट में कुल 23 मौतों का उल्लेख किया गया, जिनमें से 16 मौतों को दूषित पानी से होना स्वीकार किया गया, जबकि चार मामलों में असमंजस की स्थिति बताई गई है। वहीं तीन मौतों को दूषित पानी से जोड़ने से इनकार किया गया। अदालत ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें मौतों के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज ही नहीं किए गए हैं।

‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द पर हाईकोर्ट की आपत्ति

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने रिपोर्ट में प्रयुक्त ‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पूछा कि क्या यह शब्द मेडिकल साइंस में मान्य है या केवल औपचारिकता निभाने के लिए रिपोर्ट में जोड़ा गया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि बिना ठोस वैज्ञानिक आधार के ऐसे शब्दों का प्रयोग रिपोर्ट की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

मुख्य सचिव रहे वर्चुअल रूप से उपस्थित

सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव अनुराग जैन वर्चुअल माध्यम से लगभग दस मिनट तक उपस्थित रहे। कोर्ट ने प्रशासन से स्पष्ट और प्रमाणिक जवाब देने की अपेक्षा जताई।

30 प्रतिशत क्षेत्र में बहाल हुई जलापूर्ति

नगर निगम ने अदालत को बताया कि भागीरथपुरा के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र में जलापूर्ति दोबारा शुरू कर दी गई है, जो करीब साढ़े नौ किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। साथ ही दूषित पानी देने वाले 16 बोरवेल बंद किए जाने की जानकारी भी दी गई।
हालांकि याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि यदि ये बोरवेल बंद कर दिए गए हैं, तो रहवासियों के लिए वैकल्पिक जल व्यवस्था क्या है।

पोस्टर-पैम्फलेट पर भी उठे सवाल

निगम की ओर से बताया गया कि नागरिकों को पोस्टर और पैम्फलेट के माध्यम से सतर्क किया जा रहा है, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अधिकांश निवासी अशिक्षित हैं, ऐसे में यह तरीका प्रभावी नहीं है।

34 मानकों की जगह सिर्फ 8 पर जांच

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि वर्तमान में पानी की गुणवत्ता की जांच केवल 8 मानकों पर की गई, जबकि वर्ष 2018 में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 34 मानकों पर जांच कर पानी को फीकल कंटामिनेटेड घोषित किया था। याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य जांच मानकों की जानकारी भी दी।

मुआवजे को लेकर भी सवाल

एडवोकेट अजय बागड़िया ने अदालत को बताया कि 16 मौतों को सरकारी स्तर पर दूषित पानी से जोड़ा गया, लेकिन न तो रिपोर्ट में मौत का स्पष्ट कारण दर्ज है और न ही शासन की ओर से कोई मुआवजा दिया गया। मृतकों के परिजनों को जो राशि मिली है, वह रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा दी जा रही है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब अन्य हादसों में शासन मृतक के परिजनों को 4-4 लाख रुपये मुआवजा देता है, तो दूषित पानी से जान गंवाने वालों के जीवन का मूल्य क्यों नहीं तय किया जा रहा।

आदेश सुरक्षित

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब पूरे प्रदेश की निगाहें इस फैसले पर टिकी हैं, जो भविष्य में प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा तय कर सकता है।

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