
नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम। चुनावी वर्ष में केरल की राजनीति में सांस्कृतिक पहचान और अस्मिता का प्रश्न केंद्र में आ गया है। केंद्रीय कैबिनेट ने राज्य का नाम ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इससे पहले राज्य विधानसभा इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर चुकी थी।
सबसे अहम बात यह रही कि इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ वाम मोर्चा, भाजपा और कांग्रेस-नीत यूडीएफ—तीनों ने समर्थन दिया। राजनीतिक जानकार इसे चुनावी साल में दुर्लभ सहमति और प्रतीकात्मक राजनीति का सशक्त उदाहरण मान रहे हैं।
“मूल और सांस्कृतिक रूप से प्रामाणिक नाम”
मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan ने स्पष्ट किया कि ‘केरलम’ राज्य का मूल नाम है, जो मलयालम भाषा में प्रचलित रहा है, जबकि ‘केरल’ अंग्रेज़ी रूप है, जो औपनिवेशिक दौर में लोकप्रिय हुआ। उन्होंने भाजपा के प्रदेश नेतृत्व को लिखे पत्र में कहा कि अब समय आ गया है कि राज्य के “वास्तविक और सांस्कृतिक रूप से प्रामाणिक” नाम को बहाल किया जाए।
सरकार का तर्क है कि नाम परिवर्तन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और भाषाई पहचान की पुनर्स्थापना है।
चुनावी साल में पहचान की राजनीति
इसी वर्ष प्रस्तावित विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र यह कदम राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वाम मोर्चा लंबे समय से क्षेत्रीय भाषा, संघीय अधिकारों और सांस्कृतिक स्वायत्तता को अपने विमर्श का हिस्सा बनाता रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि भाषा और पहचान से जुड़े मुद्दे भावनात्मक प्रभाव रखते हैं। इससे सत्तारूढ़ दल को सांस्कृतिक संदेश देने का अवसर मिलता है, वहीं विपक्ष भी इस पर विरोध का जोखिम नहीं लेना चाहता
सर्वसम्मति का संदेश
राज्य विधानसभा ने 2023 में और फिर जून 2024 में तकनीकी कारणों के बाद दोबारा यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। कांग्रेस-नीत यूडीएफ और भाजपा—दोनों ने इसका समर्थन किया।
राजनीतिक दृष्टि से यह कदम सभी दलों के लिए लाभकारी माना जा रहा है। भाजपा इसे राज्य में अपनी सांस्कृतिक स्वीकार्यता बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रही है, जबकि कांग्रेस और यूडीएफ ने क्षेत्रीय भावना के विरुद्ध खड़े होने से परहेज़ किया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ‘केरलम’ की जड़ें
‘केरलम’ शब्द का उल्लेख प्राचीन शिलालेखों में मिलता है, जिनका संबंध चेरा राजाओं के काल से जोड़ा जाता है। भाषाविदों के अनुसार, यह नाम पश्चिमी तट के उस भूभाग को दर्शाता था, जो वर्तमान कर्नाटक से लेकर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक फैला था।
आधुनिक राज्य का गठन 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर हुआ। इससे पहले 1949 में त्रावणकोर और कोचीन रियासतों के विलय से त्रावणकोर-कोचीन राज्य बना था। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के बाद मलाबार और कासरगोड को जोड़कर वर्तमान केरल का निर्माण हुआ।
आगे की राह
अब नाम परिवर्तन की प्रक्रिया संवैधानिक औपचारिकताओं के तहत आगे बढ़ेगी। यदि संसद से अंतिम स्वीकृति मिलती है, तो ‘केरलम’ आधिकारिक नाम के रूप में मान्यता प्राप्त करेगा।
चुनावी साल में यह मुद्दा केवल नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता, भाषाई गौरव और राजनीतिक संदेश का प्रतीक बन चुका है। विधानसभा से लेकर केंद्र तक बनी सहमति ने इसे और अधिक महत्व दे दिया है।
