Wednesday, February 25

नक्सलवाद पर निर्णायक चोट: टॉप कमांडर देवजी समेत चार बड़े नेताओं ने डाले हथियार

नई दिल्ली/हैदराबाद। देश को 31 मार्च तक नक्सलवाद से मुक्त करने के संकल्प के बीच सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी कामयाबी मिली है। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के शीर्ष कमांडर देवजी उर्फ तिप्परी थिरूपति (62) और संग्राम उर्फ मल्ला राजी रेड्डी (76) समेत चार वरिष्ठ नक्सल नेताओं ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। सूत्रों के मुताबिक, जल्द ही करीब 50 अन्य नक्सली भी हथियार छोड़ सकते हैं।

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केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने गुवाहाटी में सीआरपीएफ के 87वें स्थापना दिवस समारोह में कहा कि देश ने अगले महीने की 31 तारीख तक नक्सलवाद को जड़ से मिटाने का संकल्प लिया है। उन्होंने Central Reserve Police Force और उसकी कोबरा बटालियन की भूमिका को “अभूतपूर्व” बताया।

44 साल बाद मुख्यधारा में वापसी

तेलंगाना के डीजीपी B Shivadhar Reddy के सामने देवजी और संग्राम ने आधिकारिक रूप से सरेंडर किया। उनके साथ बड़े चोक्का राव उर्फ दामोदर उर्फ जगन और नूने नरसिम्हा रेड्डी उर्फ नरसिम्हा ने भी हथियार डाल दिए।

देवजी पिछले 44 वर्षों से भूमिगत था और कभी पकड़ा नहीं गया। वह संगठन की शीर्ष कमान में सक्रिय भूमिका निभा रहा था और केंद्रीय समिति की प्रस्तावित बैठक में उसे सचिव बनाए जाने की चर्चा थी। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, खराब स्वास्थ्य और बदलते हालात उसके आत्मसमर्पण के प्रमुख कारण रहे।

देवजी ने कहा कि वह अब कानूनी दायरे में रहकर समाज की समस्याओं के समाधान के लिए काम करना चाहता है। इसे उसके “नए राजनीतिक जीवन” की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

हिंसा छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति

छत्तीसगढ़ में बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पटलिंगम ने कहा कि यह आत्मसमर्पण वामपंथी उग्रवाद के अंत की दिशा में “ऐतिहासिक मोड़” है। उनका कहना है कि संगठन के शीर्ष नेताओं का मुख्यधारा में लौटना अन्य उग्रवादियों के लिए भी प्रेरक संकेत है।

सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियां नक्सलियों के एक बड़े समूह के संपर्क में हैं और मुठभेड़ के बजाय आत्मसमर्पण के विकल्प को प्राथमिकता दी जा रही है। यदि आने वाले दिनों में 50 और उग्रवादी सरेंडर करते हैं, तो यह अभियान को निर्णायक बढ़त दिला सकता है।

पारिवारिक और संगठनात्मक पृष्ठभूमि

देवजी ने 1991 में अरिके जैनी उर्फ सृजना से विवाह किया था, जो स्वयं संगठन की सक्रिय सदस्य थीं। 2020 में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई थी। देवजी को 2002 में केंद्रीय समिति का सदस्य बनाया गया और बाद में शीर्ष स्तर की जिम्मेदारियां सौंपी गईं।

क्या बदल रहा है परिदृश्य?

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार ऑपरेशनों, खुफिया नेटवर्क की मजबूती और विकास योजनाओं के प्रभाव से नक्सली संगठनों की पकड़ कमजोर हुई है। शीर्ष नेतृत्व के आत्मसमर्पण से संगठनात्मक ढांचे को गहरा झटका लगा है।

सरकार की रणनीति अब “विकास और सुरक्षा” के दोहरे मॉडल पर केंद्रित है—जहां एक ओर कठोर कार्रवाई जारी है, वहीं आत्मसमर्पण करने वालों के पुनर्वास पर भी जोर दिया जा रहा है।

यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो 31 मार्च तक नक्सलवाद मुक्त भारत का लक्ष्य हकीकत के और करीब पहुंच सकता है।

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