
नई दिल्ली। राष्ट्रपति भवन परिसर में आज ‘राजाजी उत्सव’ के तहत स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। यह प्रतिमा केंद्रीय प्रांगण में स्थापित की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इस आयोजन का उल्लेख करते हुए इसे गुलामी की मानसिकता से मुक्ति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
पीएम मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के दौरान उन्होंने ‘पंच-प्राण’ का आह्वान किया था, जिनमें से एक गुलामी की मानसिकता से मुक्ति है। उन्होंने कहा कि देश अब औपनिवेशिक प्रतीकों की जगह भारतीय संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को उचित सम्मान दे रहा है।
प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रपति भवन परिसर में ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा स्थापित थी, जिसे अब हटाकर उसकी जगह राजाजी की प्रतिमा लगाई जा रही है।
कौन थे सी. राजगोपालाचारी?
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘राजाजी’ कहा जाता है, का जन्म 10 दिसंबर 1878 को मद्रास प्रेसीडेंसी में हुआ था। वे एक प्रखर वकील, चिंतक और स्वतंत्रता सेनानी थे।
उन्होंने वकालत छोड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन थामा।
रॉलेट एक्ट के विरोध, असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
15 अगस्त 1947 के बाद वे स्वतंत्र भारत के पहले और अंतिम भारतीय गवर्नर-जनरल बने।
1950 में भारत के गणतंत्र बनने के साथ यह पद समाप्त हो गया।
वे पश्चिम बंगाल के पहले गवर्नर भी रहे।
1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
वे महात्मा गांधी के समधी भी थे।
राजाजी अपने सादगीपूर्ण जीवन, प्रशासनिक दक्षता और स्वतंत्र विचारधारा के लिए जाने जाते थे।
प्रदर्शनी भी होगी आयोजित
‘राजाजी उत्सव’ के अंतर्गत राष्ट्रपति भवन में 24 फरवरी से 1 मार्च तक एक विशेष प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। इसमें राजगोपालाचारी के जीवन, विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को दर्शाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से अपील की है कि वे इस प्रदर्शनी का अवलोकन कर उनके विचारों से प्रेरणा लें।
ऐतिहासिक प्रतीकों का पुनर्स्थापन
यह पहल औपनिवेशिक दौर के प्रतीकों की जगह भारतीय महापुरुषों को प्रमुख स्थान देने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा मानी जा रही है। राष्ट्रपति भवन में राजाजी की प्रतिमा की स्थापना स्वतंत्र भारत की वैचारिक विरासत को सम्मान देने का प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
