Thursday, May 21

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दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पतालों में स्टाफ संकट गहराया: हर पांच में एक डॉक्टर का पद खाली

नई दिल्ली: देश की राजधानी के प्रमुख केंद्रीय सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी सामने आई है। राज्यसभा में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के बड़े चिकित्सा संस्थानों में लगभग हर पांच में से एक डॉक्टर का पद रिक्त है। नर्सिंग स्टाफ के मामले में भी स्थिति चिंताजनक है, जहां 13 प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं।

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वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज-सफदरजंग अस्पताल, अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज-डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल तथा लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज समेत प्रमुख संस्थानों में डॉक्टरों के कुल 1,471 स्वीकृत पदों में से 309 पद खाली हैं। इसी तरह नर्सों के 5,499 स्वीकृत पदों में से 739 पद भरे नहीं गए हैं।

अस्पतालवार आंकड़ों पर नजर डालें तो सफदरजंग अस्पताल में 19 प्रतिशत डॉक्टरों के पद रिक्त हैं, जबकि राम मनोहर लोहिया और लेडी हार्डिंग अस्पताल में यह आंकड़ा करीब 23 प्रतिशत तक पहुंच गया है। लेडी हार्डिंग अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ की कमी भी लगभग 19 प्रतिशत दर्ज की गई है।

ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की हालत और गंभीर

ग्रामीण स्वास्थ्य प्रशिक्षण केंद्र (RHTC) की स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां डॉक्टरों के 46 स्वीकृत पदों में से 16 पद खाली हैं, यानी करीब 35 प्रतिशत की कमी। नर्सिंग स्टाफ की स्थिति अत्यंत खराब है, जहां 41 में से 36 पद रिक्त हैं — जो 88 प्रतिशत तक की कमी को दर्शाता है। पैरामेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी बताई गई है।

स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने संसद में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए राज्य सरकारों के अस्पतालों के रिक्त पदों का डेटा केंद्र के पास उपलब्ध नहीं होता। प्रस्तुत आंकड़े केवल केंद्र सरकार के अधीन संस्थानों से संबंधित हैं।

कमी दूर करने के प्रयास

सरकार ने स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए मेडिकल शिक्षा के विस्तार पर जोर दिया है। देशभर में 157 नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 137 पहले ही संचालित हो चुके हैं। इन कॉलेजों को पिछड़े और कम सेवा वाले जिलों में प्राथमिकता दी जा रही है। साथ ही राष्ट्रीय आघात और जलन चोट कार्यक्रम के तहत 196 ट्रॉमा केयर सुविधाओं को भी स्वीकृति दी गई है।

ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए नेशनल हेल्थ मिशन के अंतर्गत राज्यों को प्रोत्साहन भत्ता, विशेषज्ञों को अतिरिक्त मानदेय और स्नातकोत्तर प्रवेश में वरीयता जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।

मरीजों और कर्मचारियों पर बढ़ता दबाव

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय से खाली पड़े पदों के कारण मौजूदा कर्मचारियों पर काम का अत्यधिक बोझ बढ़ गया है। इसका असर मरीजों को मिलने वाली सेवाओं, इलाज में देरी और चिकित्सा प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर साफ दिखाई दे रहा है। चूंकि ये अस्पताल देशभर से आने वाले मरीजों का इलाज करते हैं, इसलिए स्टाफ की कमी का असर व्यापक स्तर पर महसूस किया जा रहा है।

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