Wednesday, February 11

मेडिकल कॉलेज पर NDA में तकरार: गोपालगंज में JDU-बीजेपी विधायक आमने-सामने, श्रेय और स्थान पर बढ़ा विवाद

गोपालगंज: हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने की सरकारी घोषणा जहां आम जनता के लिए राहत की खबर थी, वहीं गोपालगंज में यह मुद्दा एनडीए गठबंधन के भीतर खींचतान का कारण बन गया है। जदयू विधायक मंजीत सिंह और भाजपा विधायक मिथिलेश तिवारी मेडिकल कॉलेज के स्थान को लेकर आमने-सामने आ गए हैं। दोनों नेताओं के बीच बयानबाज़ी तेज हो गई है और विवाद अब राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का रूप लेता दिख रहा है।

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जमीन चयन पर विवाद

जदयू विधायक मंजीत सिंह का आरोप है कि थावे में प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज की जमीन को लेकर तकनीकी अड़चनें हैं। उनके मुताबिक चयनित 25 एकड़ 20 डेसमिल भूमि कृषि विभाग की है, जिसका अनापत्ति प्रमाणपत्र अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। इसके उलट मांझा के धनखड़ में 24 एकड़ 37 डेसमिल गैरमजरुआ जमीन परियोजना के लिए उपयुक्त पाई गई है। इसलिए मेडिकल कॉलेज धनखड़ में स्थापित किया जाना चाहिए।

श्रेय की राजनीति से बढ़ी तल्खी

सूत्रों के अनुसार विवाद का मूल कारण मेडिकल कॉलेज के स्थान के साथ-साथ उसका राजनीतिक श्रेय है। मंजीत सिंह चाहते हैं कि कॉलेज उनके विधानसभा क्षेत्र बरौली के धनखड़ में बने, जबकि भाजपा विधायक मिथिलेश तिवारी और अन्य स्थानीय नेताओं के प्रभाव से परियोजना थावे की ओर बढ़ती दिख रही है। इसी को लेकर दोनों खेमों के बीच तनातनी तेज हो गई है।

बयानबाज़ी ने लिया राजनीतिक रंग

विवाद अब व्यक्तिगत राजनीतिक दायरे तक पहुंच गया है। मिथिलेश तिवारी ने मंजीत सिंह को अपने क्षेत्र तक सीमित रहने की सलाह दी है। जवाब में मंजीत सिंह ने कहा कि विकास की राजनीति सीमाओं में नहीं बंधती। उन्होंने दावा किया कि बैकुंठपुर के विकास में भी उनका योगदान है और वे वहां की राजनीति से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

पुराना है अंदरूनी टकराव का इतिहास

गठबंधन के भीतर क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर टकराव कोई नया नहीं है। वर्ष 2023 में भी जदयू के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह और मंत्री अशोक चौधरी के बीच शेखपुरा क्षेत्र में राजनीतिक सक्रियता को लेकर तीखा विवाद हुआ था। उस घटना ने भी पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को उजागर किया था।

जनता के मुद्दे पर राजनीति हावी

गोपालगंज में मेडिकल कॉलेज का मुद्दा जहां स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार से जुड़ा है, वहीं राजनीतिक खींचतान के कारण यह विकास की बजाय वर्चस्व की लड़ाई बनता जा रहा है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार इस विवाद को कैसे सुलझाती है और जनता को कब तक मेडिकल कॉलेज की सौगात मिल पाती है।

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