
नई दिल्ली: पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ कथक नृत्यांगना उमा शर्मा ने हाल ही में आलोक पराड़कर से विशेष बातचीत में कथक और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बदलते स्वरूप पर अपने विचार साझा किए। 83 वर्ष की उम्र में भी दिल्ली की ठंड में सक्रिय रहते हुए उन्होंने स्वामी हरिदास-तानसेन संगीत नृत्य महोत्सव का आयोजन किया, जिसमें दिग्गज कलाकारों ने हिस्सा लिया और युवा पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से रूबरू होने का अवसर मिला।
उमा शर्मा ने कहा कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है, इसे विरासत की तरह संरक्षित रखना चाहिए। उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों को सलाह दी कि चाहे वे आधुनिकता में कितने भी आगे बढ़ें, संगीत की शुद्धता और पवित्रता से समझौता न करें।
कथक के बदलते स्वरूप पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “आजकल की नृत्यांगनाएं तरह-तरह के प्रयोग कर रही हैं। पंडित बिरजू महाराज भी मानते थे कि कथक को आधुनिक बनाने के नाम पर कई बार इसकी शुद्धता खो जाती है। मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि कथक की परंपरा और भाव प्रदर्शन को सुरक्षित रखा जाए।”
स्वामी हरिदास-तानसेन संगीत नृत्य महोत्सव की शुरुआत लगभग 35 साल पहले वृंदावन के निधि वन में हुई थी। उमा शर्मा ने इसके आयोजन को दिल्ली में आगे बढ़ाया और यह महोत्सव अब 27वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने बताया कि संगीतप्रेमियों की बड़ी संख्या में भागीदारी और युवा पीढ़ी का उत्साह इसे अन्य समारोहों से अलग बनाता है।
उमा शर्मा आज भी कथक का प्रशिक्षण देती हैं और इसके शुद्ध स्वरूप को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं। उन्होंने सूरदास, तुलसीदास, केशवदास और मिर्जा गालिब जैसी कविताओं पर अपने नृत्य प्रदर्शन के अनुभव साझा किए। इसके अलावा उन्होंने हरिवंश राय बच्चन और अटल बिहारी वाजपेयी की रचनाओं को भी कथक के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
उन्होंने कहा, “कथक केवल नृत्य नहीं, यह भावों और संस्कृति की भाषा है। इसे संरक्षित रखना और युवा पीढ़ी तक सही तरीके से पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है।”
