Wednesday, January 28

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-यूरोप आमने-सामने, नाटो के भविष्य पर मंडराया संकट

 

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ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव लगातार गहराता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक रुख ने 32 सदस्य देशों वाले सैन्य गठबंधन नाटो के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। यूरोपीय देशों को आशंका है कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर जबरन कब्जे की दिशा में कदम बढ़ा सकता है, जबकि ट्रंप इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देख रहे हैं।

 

फ्रांस ने ग्रीनलैंड के पास अपना एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात कर दिया है। इसके साथ ही ब्रिटेन, जर्मनी और इटली जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दी है कि ग्रीनलैंड पर किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई स्वीकार्य नहीं होगी। ग्रीनलैंड डेनमार्क के प्रशासन के अंतर्गत आता है, जो स्वयं नाटो का सदस्य देश है।

 

‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का तर्क दे रहे ट्रंप

 

राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। अमेरिका यहां अपना अत्याधुनिक ‘गोल्डन डोम डिफेंस सिस्टम’ स्थापित करना चाहता है, जिससे रूस और चीन की मिसाइल क्षमताओं पर नजर रखी जा सके। इसी कारण ट्रंप लगातार ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की बात दोहराते रहे हैं।

 

इस मुद्दे पर ट्रंप ने अपने यूरोपीय सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए भारी टैरिफ लगाने की धमकी भी दी है। उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पर भी तंज कसे हैं।

 

नाटो में दरार की आशंका

 

नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी सैन्य सहयोग के बिना यूरोप अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि यूरोप और अमेरिका एक-दूसरे पर निर्भर हैं और नाटो की मजबूती इसी साझेदारी से बनी रहती है।

 

नाटो के अनुच्छेद-5 के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला पूरे संगठन पर हमला माना जाता है, और सभी देशों को सामूहिक सैन्य सहायता देनी होती है। ऐसे में यदि अमेरिका और डेनमार्क जैसे सदस्य देशों के बीच टकराव बढ़ता है, तो यह नाटो के लिए अभूतपूर्व संकट बन सकता है।

 

विशेषज्ञों की राय

 

विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. राजकुमार शर्मा का कहना है कि अमेरिका के नाटो से बाहर निकलने की संभावना बेहद कम है। उन्होंने कहा कि ट्रंप की बयानबाजी दरअसल दबाव बनाने और मोलभाव की रणनीति का हिस्सा है। डेनमार्क को निशाना बनाकर अमेरिका नाटो के भीतर अपनी प्रभुत्वशाली भूमिका और मजबूत करना चाहता है, ताकि यूरोपीय देश रणनीतिक स्वायत्तता का दावा न कर सकें।

 

डॉ. शर्मा के अनुसार, यदि अमेरिका कभी नाटो से अलग होता है तो यूरोप की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था बिखर जाएगी। ऐसी स्थिति में जर्मनी और पोलैंड जैसे देश परमाणु हथियार हासिल करने पर गंभीर चर्चा शुरू कर सकते हैं, जबकि ब्रिटेन और फ्रांस अकेले पूरे यूरोप की सुरक्षा की भरपाई नहीं कर पाएंगे।

 

ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी

 

ग्रीनलैंड में स्थित पिटुफिक अंतरिक्ष ठिकाना (पूर्व में थुले एयरबेस) अमेरिकी सेना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। शीतयुद्ध के दौर से सक्रिय यह बेस अब अमेरिकी अंतरिक्ष बल का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जहां से मिसाइल चेतावनी प्रणाली और अंतरिक्ष निगरानी जैसे कार्य संचालित होते हैं।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर बढ़ता विवाद इस बात का संकेत है कि युद्ध के बाद बनी नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर पड़ती जा रही है। आने वाले समय में यह द्वीप वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का बड़ा केंद्र बन सकता है।

 

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