
पंजाब के धुदिके गाँव में 28 जनवरी 1865 को जन्मे लाला लाजपत राय को ‘पंजाब केसरी’ और भारत के क्रांतिकारी नेताओं में शुमार किया जाता है। वे एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और समाज सुधारक थे, जिन्होंने भारतीय जनता में जागरूकता फैलाने के लिए राष्ट्रवादी पत्रिका ‘द पीपुल’ की स्थापना की।
1927 में भारत सरकार ने साइमन कमीशन गठित किया, जिसका उद्देश्य भारत में प्रशासन की समीक्षा करना था। इस आयोग में सात सदस्य थे और सभी ब्रिटिश थे, जबकि इसमें एक भी भारतीय प्रतिनिधि शामिल नहीं था। इसी कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य स्वतंत्रता सेनानी इस कमीशन के खिलाफ तीव्र विरोध में उतर आए।
63 साल की उम्र में लाला लाजपत राय ने लाहौर में आयोजित विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व किया। उन्होंने शांतिपूर्ण जुलूस में भाग लिया और “साइमन वापस जाओ” के नारे लगाए। लेकिन अंग्रेजों ने पुलिस के माध्यम से प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया। राय ने सीने पर पड़े प्रहारों के बावजूद कदम नहीं पीछे हटाया। उन्होंने कहा था, “मुझ पर किया गया हर प्रहार अंग्रेजी साम्राज्यवाद के ताबूत में कील ठोकने के समान है। मैं नहीं जानता कि जीवित रहूंगा या नहीं, लेकिन मेरी आत्मा स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने की प्रेरणा देती रहेगी।”
इस हिंसक लाठीचार्ज के परिणामस्वरूप लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। उनके अदम्य साहस और नेतृत्व ने स्वतंत्रता संग्राम में भारतीयों को प्रेरित किया और उन्हें स्वाधीनता की ओर अग्रसर किया।
आज हर साल 28 जनवरी को लाला लाजपत राय जयंती के रूप में उनके संघर्ष, साहस और समर्पण को याद किया जाता है।