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सऊदी-यूएई तनाव, पश्चिम एशिया में बढ़ती अशांति और वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच भारत का अहम कूटनीतिक कदम
नई दिल्ली।
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और उभरते ‘शीत युद्ध’ के माहौल के बीच भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच बनी रणनीतिक रक्षा साझेदारी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की बेहद संक्षिप्त, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण भारत यात्रा के दौरान यह सहमति बनी, जिसे आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया की राजनीति का बड़ा मोड़ माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शेख मोहम्मद का जिस आत्मीयता और गर्मजोशी से स्वागत किया गया—दोनों नेताओं का एक ही वाहन में बैठना—उससे इस यात्रा की रणनीतिक अहमियत साफ झलकती है। इस दौरान भारत और यूएई ने द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर 200 अरब डॉलर तक ले जाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई, लेकिन सबसे अहम फैसला रहा रक्षा क्षेत्र में ऐतिहासिक साझेदारी का।
खाड़ी में ‘शीत युद्ध’ के बीच भारत की एंट्री
यूएई राष्ट्रपति का यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब खाड़ी क्षेत्र असाधारण तनाव से गुजर रहा है। सऊदी अरब और यूएई—जो कभी हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक ही सैन्य गठबंधन का हिस्सा थे—आज प्रभुत्व की लड़ाई में आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। सूडान संकट से लेकर क्षेत्रीय नेतृत्व तक, दोनों देशों के बीच रिश्ते इस कदर बिगड़ चुके हैं कि इसे नया ‘खाड़ी शीत युद्ध’ कहा जाने लगा है।
इतना ही नहीं, इजरायल-गाजा संघर्ष, ईरान और अमेरिका के बीच तीखी बयानबाजी और क्षेत्र में सैन्य अस्थिरता ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है। ऐसे दौर में भारत-यूएई रक्षा करार का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
क्यों अहम है भारत–यूएई रक्षा डील
यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य भी। भारत में निवेश के मामले में भी यूएई शीर्ष देशों में शामिल है। लेकिन मौजूदा हालात में यह रक्षा साझेदारी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा संतुलन से भी जुड़ी है।
पिछले वर्ष क्षेत्रीय संघर्षों से मिली सीख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया की आग भारत तक भी पहुंच सकती है—चाहे वह ऊर्जा सुरक्षा हो, समुद्री मार्ग हों या प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा। ऐसे में खाड़ी के एक प्रभावशाली और संसाधन-संपन्न देश के साथ रक्षा सहयोग भारत के लिए बेहद अहम हो जाता है। वहीं, सऊदी अरब से रिश्तों में आई दरार के बाद यूएई को भी एक भरोसेमंद और संतुलित साझेदार की तलाश है—और भारत इस भूमिका में फिट बैठता है।
क्या सैन्य गठबंधन की ओर बढ़ रहे हैं भारत–यूएई?
रणनीतिक रक्षा साझेदारी के फ्रेमवर्क को लेकर अटकलें हैं कि यह किसी संभावित सैन्य गठबंधन का रूप ले सकता है। हालांकि, विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने इन कयासों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस समझौते को किसी “काल्पनिक युद्ध परिदृश्य” के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद, रक्षा सहयोग, तकनीक साझेदारी और सामरिक समन्वय आने वाले समय में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
भारत की संतुलित खाड़ी नीति
यह भी साफ किया गया है कि यूएई के साथ बढ़ती नजदीकी का अर्थ यह नहीं कि भारत के अन्य खाड़ी देशों से रिश्ते कमजोर पड़ेंगे। इस क्षेत्र में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक रहते हैं और भारत किसी भी हाल में संतुलन बिगाड़ने का जोखिम नहीं ले सकता। लेकिन इतना तय है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत और यूएई ने अपने-अपने हितों को ध्यान में रखते हुए रक्षा और व्यापारिक संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का फैसला किया है।
एक ओर भारत को पाकिस्तान जैसे स्थायी सुरक्षा चुनौती से निपटना है, वहीं यूएई को उभरते क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों से। ऐसे में यह साझेदारी केवल दो देशों का समझौता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका का स्पष्ट संकेत भी है।