Monday, January 19

पार्टी चलाना कोई दाल-भात का कौर नहीं: 52 के अखिलेश और 36 के तेजस्वी, विरासत कभी-कभी बन जाती है बोझ

पटना: विरासत मिलना हमेशा आसान नहीं होता। पार्टी की कमान संभालना किसी नए नेता के लिए उतना सरल नहीं जितना लगता है। अक्सर नए नेता की तुलना उसके संस्थापक से की जाती है, और यही तुलना उनकी नाकामी का सबसे बड़ा कारण बन सकती है।

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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के उदाहरण से यह बात साफ है। अखिलेश यादव ने विदेश में पढ़ाई के बाद राजनीति में कदम रखा, लेकिन अपने पिता मुलायम सिंह यादव की पार्टी को आशानुसार नहीं चला पाए। परिणामस्वरूप समाजवादी पार्टी कमजोर हुई और भाजपा लगातार दो बार सत्ता में आई।

अब चर्चा है कि लालू यादव की पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद), की कमान उनके पुत्र तेजस्वी यादव को सौंपी जा सकती है। हालांकि, केवल पुत्र होने के कारण किसी भी पार्टी को संभालना पर्याप्त नहीं होता। तेजस्वी यादव को उनके पिता लालू यादव की क्षमता, अनुभव और राजनीतिक कौशल के सामने कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

लालू यादव: विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग
लालू यादव भारतीय राजनीति के ऐसे नेता हैं जिनकी तुलना मुश्किल है। वे किसी धारा के खिलाफ भी तैर सकते हैं और जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर हैं। 1988 में लोकदल के अनुभवी नेताओं को पीछे छोड़कर नेता प्रतिपक्ष बने और 1990 में मुख्यमंत्री पद हासिल किया। अल्पमत सरकार के बावजूद उन्होंने भाजपा, वामदल, झामुमो और निर्दलीय सहयोगियों के साथ पांच वर्षों तक सरकार चलाई और पूरी हनक के साथ राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखा।

तेजस्वी यादव: गठबंधन में घटक दलों पर प्रभाव सीमित
2025 के विधानसभा चुनाव में राजद के कई अहम फैसले तेजस्वी यादव ने अनौपचारिक रूप से लिए। अनुभव की कमी के कारण उनका प्रभाव घटक दलों पर लालू यादव जैसी पकड़ नहीं दिखा सका। केवल जातीय समीकरणों पर निर्भर रहने की वजह से कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने उनकी रणनीति पर सवाल उठाए।

कमजोर संगठन, कमजोर नेतृत्व से खत्म हो जाती है पार्टी
किसी भी पार्टी का संगठन और नेतृत्व कमजोर हो जाए तो वह अपने अस्तित्व को खोने लगती है। बिहार में सीपीआई का उदाहरण सामने है। एक समय 35 विधायक वाली पार्टी आज केवल एक-दो सीटों तक सीमित रह गई। संगठन की कमजोरी ही इसका कारण बनी।
राजद में भी अब यही स्थिति दिख रही है। लालू यादव के जमाने में संगठन केवल नाममात्र था। पार्टी का असली आधार लालू यादव का करिश्मा था। जब तक लालू यादव की जीत मिलती रही, संगठन की कमजोरी दिखाई नहीं दी। लेकिन तेजस्वी लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुके हैं और इस बार यह कमजोरी स्पष्ट हो गई।

अटल बिहारी वाजपेयी की कहावत याद आती है: “पार्टी नेताओं से नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं से चलती है।” राजद के लिए यह अब एक गंभीर संदेश बन चुका है।

 

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