Friday, January 16

अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ बढ़ती नफरत: ‘अपने देश वापस जाओ’ से गूंज रहे दफ्तर और सोशल मीडिया — सख्त इमीग्रेशन नीतियों के बीच अमेरिकी कंपनियों में नस्लवाद पर सवाल

नई दिल्ली।
अमेरिका, जो लंबे समय तक अवसरों और विविधता का प्रतीक माना जाता रहा, अब भारतीय मूल के लोगों के लिए असहज होता जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में सख्त अप्रवासन नीतियों के लागू होने के बाद अमेरिका में भारत-विरोधी भावनाओं में तेज़ उछाल देखा जा रहा है। इसका असर न केवल सोशल मीडिया तक सीमित है, बल्कि FedEx, Walmart और Verizon जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनियों के कार्यस्थलों तक पहुंच चुका है।

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कॉरपोरेट दफ्तरों में नस्लवाद की आहट
फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों में काम कर रहे भारतीय मूल के कर्मचारियों को खुले और छिपे दोनों तरह के नस्लीय हमलों का सामना करना पड़ रहा है। क्रिसमस से पहले एक क्षतिग्रस्त FedEx ट्रक का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर वायरल हुआ। इसके बाद कंपनी के भारतीय मूल के सीईओ राज सुब्रमण्यम को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। एक यूजर ने यहां तक लिख दिया— हमारी महान अमेरिकी कंपनियों पर इस घटिया भारतीय कब्जे को रोको।”

दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों ने यह आरोप फैलाया कि भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां छीनकर अपने ही लोगों को नियुक्त किया है। हालांकि FedEx ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कंपनी 50 वर्षों से मेरिट आधारित संस्कृति को बढ़ावा देती आ रही है और उसकी वर्कफोर्स 220 से अधिक देशों की विविधता को दर्शाती है।

एच-1बी वीजा बना नफरत की जड़
भारत विरोधी बयानबाजी की एक बड़ी वजह एच-1बी वीजा को लेकर ट्रंप प्रशासन की सख्ती मानी जा रही है। भारतीय नागरिक एच-1बी वीजा धारकों का करीब 71 प्रतिशत हिस्सा हैं। सितंबर में सरकार द्वारा ‘प्रोजेक्ट फायरवॉल’ शुरू किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर भारतीय कर्मचारियों के खिलाफ आरोपों की बाढ़ आ गई। कुछ गुमनाम अकाउंट्स ने Walmart और Verizon जैसे संस्थानों के कर्मचारियों की निजी जानकारियां तक लीक कर दीं।

सरकार ने एच-1बी वीजा पर 1 लाख डॉलर तक का शुल्क लगाने और सबसे अधिक वेतन पाने वाले आवेदकों को प्राथमिकता देने की घोषणा की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन नीतियों के बाद ऑनलाइन भारत विरोधी टिप्पणियों और धमकियों में तेज़ बढ़ोतरी हुई है।

अपने देश वापस जाओ’ की गूंज
ओहियो के गवर्नर पद के उम्मीदवार विवेक रामास्वामी—जो स्वयं भारतीय अप्रवासियों के बेटे हैं—को भी MAGA समर्थकों के नस्लीय हमलों का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर उन्हें ‘अपने देश वापस जाओ’ जैसे कमेंट किए गए। रामास्वामी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, यह विचार कि कोई ‘हेरिटेज अमेरिकी’ दूसरे अमेरिकी से अधिक अमेरिकी है, अपने आप में गैर-अमेरिकी है।”

आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं
एडवोकेसी ग्रुप ‘स्टॉप AAPI हेट’ और काउंटरटेररिज्म कंपनी मूनशॉट के विश्लेषण के मुताबिक, नवंबर तक दक्षिण एशियाई लोगों के खिलाफ हिंसा की धमकियों में 12 प्रतिशत और अपमानजनक ऑनलाइन भाषा के इस्तेमाल में 69 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञ इसे संगठित नफरत अभियानों का नतीजा मान रहे हैं, जिनमें भारतीयों को ‘नौकरी चुराने वाले’ और ‘वीजा स्कैमर’ के रूप में पेश किया जा रहा है।

कॉरपोरेट चुप्पी पर सवाल
ट्रंप प्रशासन की सख्ती के बाद कई अमेरिकी कंपनियों ने विविधता, समानता और समावेशन (DEI) कार्यक्रमों से दूरी बना ली है। इससे कंपनियां भारत-विरोधी नस्लवाद पर खुलकर बोलने से कतराने लगी हैं। यहां तक कि FBI निदेशक काश पटेल को दिवाली की शुभकामनाएं देने पर भी सोशल मीडिया पर तीखे हमलों का सामना करना पड़ा।

निष्कर्ष
अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ बढ़ती नफरत केवल इमीग्रेशन नीति का नतीजा नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल का संकेत है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपनी बहुसांस्कृतिक पहचान को बचा पाएगा, या ‘अमेरिका फर्स्ट’ की राजनीति विविधता पर भारी पड़ जाएगी।

 

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