
जयपुर। 78वें आर्मी डे के मौके पर जयपुर में आयोजित परेड में भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने राजस्थान की वीर भूमि के सपूत मेजर शैतान सिंह भाटी को याद किया। उन्होंने कहा कि फौज में सबसे बहादुर सैनिक राजस्थान से हैं, और शैतान सिंह भाटी उसी वीर परंपरा के प्रतीक हैं।
सैन्य परिवार में जन्म, बचपन से देशभक्ति का जज्बा
मेजर शैतान सिंह भाटी का जन्म 1 दिसंबर 1924 को तत्कालीन जोधपुर रियासत के बनासोर गांव में हुआ। उनका परिवार सैन्य परंपरा से जुड़ा हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने जोधपुर के प्रतिष्ठित चोपासनी स्कूल से प्राप्त की। 1949 में उन्होंने भारतीय सेना की कुमाऊं रेजिमेंट में शामिल होकर देशसेवा की राह चुनी।
नेतृत्व और साहस का प्रतीक
सेना में अपनी अनुशासनप्रियता, साहस और नेतृत्व क्षमता से उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों का भरोसा जीता। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्हें 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी की कमान सौंपी गई।
रेजांग ला में अद्वितीय पराक्रम
18 नवंबर 1962 को लद्दाख के रेजांग ला क्षेत्र में मेजर भाटी ने अद्वितीय शौर्य का परिचय दिया। चौकी पर केवल 120 भारतीय सैनिक थे, जबकि चीनी सेना की संख्या लगभग 3 हजार थी। भारी असमानता के बावजूद मेजर भाटी ने पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया।
वे युद्ध के दौरान एक चौकी से दूसरी चौकी तक घूमकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाते रहे, घायल होने के बावजूद रणनीति तय करते रहे। उनकी मौजूदगी ने जवानों में नई ऊर्जा भर दी और उन्होंने अंतिम सांस तक मोर्चा संभाले रखा।
वीरगति और अमर बलिदान
भीषण गोलीबारी के दौरान मेजर शैतान सिंह गंभीर रूप से घायल हुए। साथी उन्हें सुरक्षित निकालने का प्रयास कर रहे थे, तब उन्होंने सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया और स्वयं मुकाबला करते रहे। इसी दौरान उन्होंने वीरगति प्राप्त की। इस युद्ध में 120 में से 114 भारतीय जवान शहीद हुए, लेकिन उन्होंने 1300 से अधिक चीनी सैनिकों को ढेर कर दुश्मन की बढ़त रोकी।
परमवीर चक्र से सम्मानित
मेजर शैतान सिंह भाटी के अदम्य साहस, असाधारण नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान – परमवीर चक्र से नवाजा गया। उनका जीवन और बलिदान आज भी देशभक्ति और वीरता की मिसाल है।