Friday, May 15

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यौन अपराध मामलों में संवेदनशील सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिए

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध मामलों की सुनवाई को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) को व्यापक ड्राफ्ट गाइडलाइन तैयार करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये दिशानिर्देश भारतीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों और मूल्यों को ध्यान में रखकर बनाए जाएँ और किसी विदेशी कानूनी शब्दावली या मॉडल की नकल न की जाए।

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मामला और आदेश

सुप्रीम कोर्ट की बेंच, CJI सूर्यकांत की अगुवाई में, 2025 में स्वतः संज्ञान लिए गए एक मामले की सुनवाई कर रही थी। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें एक नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ने, पायजामा की डोरी तोड़ने और उसे पुलिया के नीचे घसीटने के प्रयास को बलात्कार या बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पहले ही त्रुटिपूर्ण बताते हुए निरस्त कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि कई बार अदालतों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा या टिप्पणियां पीड़ितों को और आहत कर सकती हैं।

व्यापक असर की संभावना

सुप्रीम कोर्ट ने 8 दिसंबर 2025 के अपने आदेश में कहा था कि यौन उत्पीड़न मामलों में असंवेदनशील न्यायिक टिप्पणियां पीड़ितों, उनके परिवार और पूरे समाज पर भयभीत करने वाला प्रभाव (Chilling Effect) डाल सकती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में इस दिशा में व्यापक निर्देश जारी किए जाएंगे, जिससे सुनवाई और न्याय प्रक्रिया दोनों ही पीड़ित-केंद्रित और संवेदनशील बनें।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उम्मीद जताई जा रही है कि यौन अपराध मामलों की सुनवाई में न्यायपालिका अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाएगी, और पीड़ितों के मानसिक और सामाजिक हितों की रक्षा होगी।

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