
नई दिल्ली/लखनऊ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने लखनऊ में इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में लगभग ढाई घंटे तक समाज के लोगों से बातचीत की। उन्होंने संघ की उपलब्धियों, समस्याओं और सम-सामयिक राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखी।
आरएसएस की अधूरी सफलता का कारण
भागवत ने स्वीकार किया कि पिछले 100 वर्षों में संघ ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं, लेकिन उसका मिशन अभी भी अधूरा है। उनका कहना था, “संघ ने बहुत काम किया है, लेकिन इसे पूर्ण सफलता नहीं मिली है, क्योंकि हिंदू समाज एकजुट नहीं है।” उन्होंने लोगों से अपील की कि बिना संघ में शामिल हुए इसे जज करने की कोशिश न करें और राष्ट्रहित में हिंदुओं को एकजुट होने की दिशा में सोचें।
संघ की सबसे बड़ी चुनौती
सवाल-उत्तर सत्र में जब मोहन भागवत से पूछा गया कि आरएसएस की सबसे बड़ी समस्या क्या है, तो उन्होंने स्पष्ट किया: “हिंदू समुदाय कई मुद्दों पर उदासीन है। भिन्न-भिन्न जातियों और पंथों से अपनी पहचान बनाने की जगह, हिंदू के तौर पर अपनी पहचान बनाना बेहतर है। सामाजिक सौहार्द समाजिक एकता का आधार है।” उन्होंने यह भी कहा कि जाति व्यवस्था धीरे-धीरे कम हो रही है और युवा पीढ़ी में इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है।
सम-सामयिक मुद्दों पर संघ का रुख
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टैरिफ युद्ध: भागवत ने कहा कि हाल की आर्थिक चुनौतियों से भारत कमजोर नहीं होगा और कोई देश इसे दबा नहीं सकेगा।
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भारतीय अर्थव्यवस्था: भागवत का कहना है कि अर्थव्यवस्था केवल पूंजीपतियों और बैंकों के हाथ में नहीं है, बल्कि यह हमारे घरों में है, और भारत दबाव झेलकर भी प्रगति कर सकता है।
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यूजीसी विवाद: सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन मामले में संघ का कोई अंतिम स्टैंड निर्णय पर निर्भर करेगा।
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मंदिरों का प्रबंधन: संघ का मत है कि मंदिरों का नियंत्रण श्रद्धालुओं के हाथों में होना चाहिए, और समाजिक मिल-जुलकर इसे प्रबंधित करे।
बीजेपी और RSS का रिश्ता
भागवत ने लंबे समय से लग रहे आरोपों को खारिज किया कि बीजेपी का रिमोट कंट्रोल संघ के हाथों में है। उनका कहना है कि बीजेपी स्वतंत्र राजनीतिक संगठन है। उन्होंने कहा, “स्वयंसेवक बीजेपी में जा सकते हैं और प्रगति कर सकते हैं, लेकिन यह कहना कि संघ पार्टी को नियंत्रित करता है, गलत है।”
