

हो, यह सच्चा परिवेश।
देश-विरोधी सोच से, होता केवल क्लेश॥

मिट्टी जिसकी देह में, बसे श्वास में प्राण।
उस भारत पर वार दें, जीवन का सम्मान॥
राष्ट्र-भक्ति से ही बने, जन-जन सदा विशेष—
देश-विरोधी सोच से, होता केवल क्लेश॥
भाषाएँ हों भिन्न सब, भिन्न रहें परिधान।
एक तिरंगा बाँधता, भारत की पहचान॥
एकता का दीप ही, करता नव-उन्मेष—
देश-विरोधी सोच से, होता केवल क्लेश॥
वीरों के बलिदान का, रखना सदा विचार।
उनके कारण ही मिला, स्वतंत्रता का द्वार॥
उनकी गौरव-गाथा दे, हमको शुभ संदेश—
देश-विरोधी सोच से, होता केवल क्लेश॥
मतभेदों का हो सदा, लोकतांत्रिक मान।
किन्तु न टूटे राष्ट्र का, मूल स्वाभिमान॥
संविधान की राह से, बढ़े राष्ट्र-परिवेश—
देश-विरोधी सोच से, होता केवल क्लेश॥
‘सौरभ’ भारत-भूमि से, रखिए सच्चा नेह।
राष्ट्र प्रथम का मंत्र ही, जीवन का सद्गेह॥
मिलकर गढ़ें भविष्य हम, प्रेम, शांति, परिवेश—
राष्ट्र प्रथम का भाव हो, यह सच्चा परिवेश।
देश-विरोधी सोच से, होता केवल क्लेश॥
✍️ — डॉ. प्रियंका सौरभ
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)


