Wednesday, February 25

भोजशाला विवाद: ASI रिपोर्ट पर बढ़ी तकरार, मुस्लिम पक्ष ने बताया ‘भ्रामक’

धार (मध्य प्रदेश): धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। एएसआई की हालिया रिपोर्ट, जिसमें कहा गया है कि कमाल मौला मस्जिद प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों से निर्मित है, को मुस्लिम पक्ष ने सिरे से खारिज कर दिया है।

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मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने रिपोर्ट को ‘गुमराह करने वाली’ बताते हुए इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि 16 मार्च को वे न्यायालय में अपनी आपत्तियां दर्ज कराएंगे।

‘मंदिर नहीं, राजा भोज के महल का मलबा’

सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने दावा किया कि एएसआई जिन पत्थरों और स्थापत्य अवशेषों का उल्लेख कर रहा है, वे किसी मंदिर को तोड़कर नहीं लाए गए, बल्कि राजा भोज के नष्ट हुए महल के मलबे से लिए गए थे।

समद के अनुसार, गुजरात के चालुक्य-सोलंकी शासकों ने राजा भोज के महल को ध्वस्त किया था। भारी पत्थरों को दूर ले जाना संभव नहीं था, इसलिए बाद में मस्जिद निर्माण में उसी मलबे का उपयोग किया गया। उन्होंने कहा, “चूंकि राजा भोज हिंदू शासक थे, इसलिए परिसर में मिलने वाली संरचनाओं में हिंदू विशेषताएं होना स्वाभाविक है।”

1963 के सर्वे का हवाला

मुस्लिम पक्ष ने 1963 में हुए एएसआई सर्वे का भी उल्लेख किया, जिसमें इस स्थल को ‘कमल मौला मस्जिद’ के रूप में दर्ज कर संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। प्रतिनिधियों का कहना है कि यह पहले भी मस्जिद थी और आज भी है, इसलिए यहां नमाज पढ़ना जारी रहेगा।

निर्माण को लेकर ऐतिहासिक दावा

अब्दुल समद ने कहा कि मस्जिद का निर्माण 1295 में आए सूफी संत कमाल मौलाना ने कराया था, जो निजामुद्दीन औलिया के खलीफा बताए जाते हैं। उनका दावा है कि मालवा शासक महमूद खिलजी द्वारा दी गई जमीन पर मदरसा और मस्जिद का निर्माण हुआ था।

हाईकोर्ट में रखे जाएंगे तर्क

मुस्लिम प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि खुदाई में मिले कई वास्तुशिल्प तत्वों को एक विशेष उद्देश्य के तहत प्रस्तुत किया गया है, जिससे रिपोर्ट एकतरफा प्रतीत होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे न्यायालय में अपने ऐतिहासिक और कानूनी तर्क विस्तार से रखेंगे।

उधर, हिंदू संगठनों का दावा है कि भोजशाला देवी वाग्देवी (सरस्वती) का प्राचीन मंदिर है। ऐसे में एएसआई की रिपोर्ट के बाद विवाद और गहराने के संकेत मिल रहे हैं।

भोजशाला प्रकरण अब कानूनी और ऐतिहासिक बहस के नए दौर में प्रवेश कर चुका है, जिसकी अगली कड़ी हाईकोर्ट की सुनवाई में तय होगी।

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