
नई दिल्ली, 24 फरवरी 2026। भारत–अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील को लेकर सियासत गरमा गई है। कांग्रेस ने इस समझौते को “किसान विरोधी” बताते हुए देश के छह राज्यों में किसान सम्मेलनों की श्रृंखला शुरू करने का ऐलान किया है। पार्टी अध्यक्ष Mallikarjun Kharge और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के नेताओं के साथ दिल्ली में रणनीतिक बैठक कर अभियान की रूपरेखा तय की।
राजनीतिक रूप से अहम राज्यों पर फोकस
कांग्रेस जिन राज्यों में सम्मेलन करने जा रही है, वे कृषि और राजनीति—दोनों लिहाज से अहम हैं।
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मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सोयाबीन व कपास की खेती प्रमुख है।
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राजस्थान में कपास और सरसों की फसल बड़े पैमाने पर होती है।
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बिहार में मक्का और बागवानी किसानों की आजीविका का आधार है।
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हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में फल, सेब और सूखे मेवे स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
पार्टी 24 फरवरी को भोपाल, 7 मार्च को यवतमाल और 9 मार्च को श्रीगंगानगर में बड़े किसान सम्मेलन आयोजित करेगी, जिनमें खरगे और राहुल गांधी की मौजूदगी तय मानी जा रही है।
ट्रेड डील पर कांग्रेस के आरोप
कांग्रेस का आरोप है कि अंतरिम ट्रेड डील में सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे “सरेंडर” किया है। राहुल गांधी का कहना है कि आयात में छूट और खुले बाजार की नीति से विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे कपास, सोयाबीन, मक्का और फल-मेवा उत्पादक किसानों की आय प्रभावित होगी।
पार्टी यह भी तर्क दे रही है कि अमेरिका अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है, जबकि भारतीय किसानों को सीमित समर्थन मिलता है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा असमान होगी।
किसान संगठनों से तालमेल की कोशिश
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस स्वतंत्र किसान संगठनों के साथ तालमेल बढ़ाने की दिशा में सक्रिय है। पार्टी मानती है कि पूर्व में कृषि कानूनों के विरोध में हुए आंदोलन से यह स्पष्ट हुआ कि जब किसान संगठन और राजनीतिक दल साथ आते हैं, तो मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन जाता है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मत है कि किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता के लिए नेतृत्व किसानों के हाथ में रहना आवश्यक है।
संसद से सड़क तक दबाव की रणनीति
कांग्रेस संसद में भी सरकार को घेरने की तैयारी में है। पार्टी ने ट्रेड डील की शर्तें सार्वजनिक करने की मांग की है और प्रश्नकाल, स्थगन प्रस्ताव व बहस के जरिए सरकार से जवाब चाहती है। यदि विवरण सामने नहीं आते, तो कांग्रेस पारदर्शिता के मुद्दे पर नैतिक बढ़त लेने की रणनीति पर काम कर रही है।
ऊर्जा आयात भी बना मुद्दा
कांग्रेस ने कृषि के साथ ऊर्जा आयात का सवाल भी जोड़ा है। पार्टी का दावा है कि फरवरी 2022 से जनवरी 2026 के बीच भारत ने रूस से लगभग 168 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा। यदि नए समझौते से ऊर्जा आयात के स्रोत बदलते हैं, तो इसका असर महंगाई पर पड़ सकता है।
अवसर और चुनौती दोनों
विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के लिए यह अभियान अवसर और जोखिम—दोनों लेकर आया है। ट्रेड डील के जटिल प्रावधानों और सरकारी आंकड़ों के बीच किसानों तक स्पष्ट संदेश पहुंचाना चुनौती होगी। साथ ही, यदि किसानों को तत्काल मूल्य या आय में गिरावट महसूस नहीं होती, तो मुद्दे की तात्कालिकता कमजोर पड़ सकती है।
इसके बावजूद, आगामी चुनावों से पहले कांग्रेस ग्रामीण मतदाताओं में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। यदि यह अभियान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल बीमा और बढ़ती लागत जैसे स्थानीय मुद्दों से जुड़ता है, तो ट्रेड डील का विरोध व्यापक किसान विमर्श का रूप ले सकता है।
साफ है कि यह केवल एक व्यापार समझौते का विरोध नहीं, बल्कि किसान राजनीति में पुनर्स्थापन की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। आने वाले हफ्तों में यह देखना अहम होगा कि यह आंदोलन संसद की बहस तक सीमित रहता है या फिर सड़कों पर नए ‘दिल्ली कूच’ की आहट देता है
