
नई दिल्ली, 23 फरवरी 2026। भारत की संसदीय कूटनीति को नई दिशा देते हुए लोकसभा अध्यक्ष Om Birla ने 60 से अधिक देशों के साथ संसदीय मैत्री समूहों के गठन की घोषणा की है। इस पहल का उद्देश्य दुनिया की विभिन्न संसदों के साथ भारत के संबंधों को और सुदृढ़ करना तथा प्रत्यक्ष संवाद को बढ़ावा देना है।
यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब वैश्विक परिदृश्य में संवाद और सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। संसदीय मैत्री समूहों के माध्यम से भारत की संसद अब पारंपरिक कूटनीति के साथ-साथ संसदीय स्तर पर भी मजबूत और नियमित संपर्क स्थापित करेगी।
सर्वदलीय भागीदारी से मजबूत होगा संदेश
इन मैत्री समूहों में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के सांसदों को शामिल किया गया है। उल्लेखनीय है कि इनमें कुछ विपक्षी सदस्य भी हैं, जिन्हें हाल ही में सदन में अनुशासनहीन व्यवहार के कारण निलंबित किया गया था।
प्रमुख नेताओं में Ravi Shankar Prasad, P. Chidambaram, Ram Gopal Yadav, Shashi Tharoor, Anurag Thakur, Hema Malini, Asaduddin Owaisi, Akhilesh Yadav, Supriya Sule और Nishikant Dubey समेत कई अन्य वरिष्ठ सांसद शामिल हैं।
सर्वदलीय प्रतिनिधित्व इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में भारत की संसद एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहती है।
किन देशों के साथ बने मैत्री समूह
इन संसदीय मैत्री समूहों का गठन जिन देशों के साथ किया गया है, उनमें United States, Russia, Germany, Japan, France, United Kingdom, Israel, Australia, Brazil, Sri Lanka, Nepal, Bhutan और European Parliament सहित अनेक राष्ट्र शामिल हैं।
इन समूहों के जरिए सांसद अपने विदेशी समकक्षों से सीधे संवाद कर सकेंगे, अनुभव साझा करेंगे और विभिन्न विषयों—जैसे व्यापार, तकनीक, सामाजिक नीतियां, संस्कृति और वैश्विक चुनौतियां—पर विचार-विमर्श करेंगे।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद कूटनीतिक सक्रियता
गौरतलब है कि हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भारत का पक्ष वैश्विक मंचों पर प्रभावी ढंग से रखने के लिए विभिन्न देशों में बहुदलीय शिष्टमंडल भेजे थे। उस पहल ने यह संदेश दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों के प्रश्न पर देश एकजुट है।
लोकसभा द्वारा 60 से अधिक देशों के साथ संसदीय मैत्री समूहों का गठन उसी कड़ी का एक महत्वपूर्ण विस्तार माना जा रहा है। यह कदम न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की संसदीय उपस्थिति को भी और प्रभावशाली बनाएगा।
भारत की संसद का यह प्रयास दर्शाता है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में संवाद, सहयोग और विश्वास ही कूटनीति की असली ताकत हैं।
