
सीहोर/भोपाल, 23 फरवरी 2026। मध्यप्रदेश के सीहोर शहर से जुड़ा एक 109 साल पुराना मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। शहर के प्रसिद्ध उद्योगपति और दानदाता रहे सेठ जुम्मा लाल रूठिया के परिवार ने 1917 में ब्रिटिश हुकूमत को दिए गए 35,000 रुपये के कर्ज की वसूली के लिए अब कानूनी नोटिस भेजने की तैयारी की है।
रूठिया परिवार का दावा है कि यह कर्ज आज तक नहीं चुकाया गया और मौजूदा कीमतों के अनुसार इसकी राशि एक करोड़ रुपये से अधिक बैठती है।
भोपाल नवाब के बाद सबसे अमीर सेठ
बताया जाता है कि उस दौर में Sultan Jahan Begum के बाद सेठ जुम्मा लाल रूठिया को क्षेत्र का दूसरा सबसे संपन्न व्यक्ति माना जाता था। सीहोर और भोपाल अंचल में उनकी बड़ी संख्या में संपत्तियां थीं।
परिवार के अनुसार, 1917 में Bhopal State के प्रशासनिक प्रबंधन को व्यवस्थित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सेठ जुम्मा लाल से 35,000 रुपये का कर्ज लिया था। इस लेन-देन की लिखित दस्तावेजी पुष्टि भी परिवार के पास मौजूद है।
वसीयत से हुआ खुलासा
सेठ जुम्मा लाल का निधन 1937 में हो गया। उनके पुत्र सेठ मानकचंद्र रूठिया को वसीयत में वह दस्तावेज मिले, जिनमें ब्रिटिश हुकूमत के साथ हुए कर्ज का उल्लेख था। अब उनके पोते विवेक रूठिया उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर ब्रिटिश क्राउन को लीगल नोटिस भेज रहे हैं।
विवेक रूठिया का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार कोई भी संप्रभु राष्ट्र पूर्व में लिए गए वैध कर्ज को चुकाने के लिए बाध्य होता है।
35,000 रुपये तब और अब
इतिहासकारों का मानना है कि 1917 में 35,000 रुपये अत्यंत बड़ी राशि थी। उस समय सोने-चांदी और जमीन की कीमतों के लिहाज से यह रकम आज के करोड़ों रुपये के बराबर बैठती है।
परिवार का दावा है कि मौजूदा मूल्यांकन के अनुसार यह राशि एक करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है, हालांकि अंतिम आंकड़ा कानूनी और वित्तीय आकलन पर निर्भर करेगा।
शहर की 40% संपत्ति पर परिवार का दावा
स्थानीय जानकारों के अनुसार, सीहोर शहर की लगभग 40 से 45 प्रतिशत बसाहट कभी रूठिया परिवार की जमीन पर बसी थी। इंदौर, भोपाल और सीहोर में आज भी कई संपत्तियां परिवार के नाम दर्ज बताई जाती हैं।
हालांकि, कई संपत्तियों पर अन्य लोगों का कब्जा है और कुछ मामलों में किरायेदार आज भी पुराने समझौते के आधार पर 100 से 500 रुपये मासिक किराया दे रहे हैं। इन संपत्तियों को लेकर परिवार और कब्जाधारियों के बीच विवाद भी जारी है।
क्या कहता है कानून?
एडवोकेट जी.के. उपाध्याय का कहना है कि यदि लिखित एग्रीमेंट मौजूद है तो ब्रिटिश क्राउन को नोटिस भेजा जा सकता है। लेकिन हर कर्ज के साथ एक समय-सीमा (टाइम लिमिट) निर्धारित होती है। यदि निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान नहीं होता, तो आगे की शर्तें भी उसी समझौते के अधीन तय होती हैं।
ऐसे में पूरा मामला उस समय हुए अनुबंध की शर्तों और अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या पर निर्भर करेगा।
इतिहास का कर्ज, अदालत की राह
109 साल पुराने इस दावे ने न केवल सीहोर बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा छेड़ दी है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि ब्रिटिश क्राउन की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और यह मामला कानूनी रूप से किस दिशा में आगे बढ़ता है।
