
पटना: बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा को नई दिशा देने वाली इंडो-नेपाल बॉर्डर सड़क परियोजना अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। यह महत्वपूर्ण केंद्रीय परियोजना भारत-नेपाल सीमा से सटे सात जिलों — पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज — को जोड़ती है।
पथ निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पाल ने परियोजना की समीक्षा करते हुए बताया कि 554 किलोमीटर लंबी सड़क का अब तक 529 किलोमीटर से अधिक निर्माण पूरा हो चुका है। परियोजना की कुल लागत लगभग 5865 करोड़ रुपये है और इसे मई महीने तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
सुरक्षा और विकास दोनों का मिश्रण
परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह सड़क सीमा सुरक्षा बल (SSB) की विभिन्न चौकियों को मुख्य सड़क मार्ग से सीधे जोड़कर जवानों की आवाजाही सुगम बनाएगी। सचिव ने स्पष्ट किया कि सड़क ‘क्विक रिस्पांस’ की सुविधा प्रदान करेगी और सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों और तस्करी पर प्रभावी रोक लगाएगी।
भौगोलिक चुनौतियों को मात
इस क्षेत्र की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और नदियों के जाल को ध्यान में रखते हुए सड़क निर्माण एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा। अब तक परियोजना के तहत 808 पुलिया और 129 छोटे-बड़े पुलों का निर्माण पूरा हो चुका है। शेष पुलों और पुलियाओं पर कार्य युद्धस्तर पर जारी है।
ग्रामीण जीवन और व्यापार में सुधार
इस सड़क के पूर्ण होने से सीमावर्ती क्षेत्रों के लाखों लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। कृषि उत्पादों को बाजार तक पहुँचाने में आसानी, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा के लिए सीधा संपर्क मार्ग और पलायन में कमी के अवसर बनेंगे। यह सड़क उत्तर बिहार के इन सात जिलों के लिए सुरक्षित, सुगम और विकासोन्मुखी परिवहन का नया मार्ग साबित होगी।
पथ निर्माण विभाग ने निर्देश दिए हैं कि शेष कार्यों में आ रहे भू-अर्जन और अन्य अवरोधों को तत्काल दूर किया जाए, ताकि परियोजना तय समय में पूरी हो सके।
निष्कर्ष: इंडो-नेपाल बॉर्डर सड़क परियोजना न केवल सुरक्षा बलों के लिए एक महत्वपूर्ण संवेदनशील मार्ग बनेगी, बल्कि सीमावर्ती ग्रामीण इलाकों में आर्थिक और सामाजिक विकास को भी गति देगी।
