
बड़वानी, 16 फरवरी 2026: मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल में सदियों पुरानी ‘ढास’ परंपरा आज भी जीवंत है। इस परंपरा के तहत जब किसी गांववाले को घर बनवाना हो या खेत में काम करना हो, तो पूरे गांव के लोग बिना किसी मजदूरी के एक जुट होकर सहायता करते हैं। हाल ही में बड़वानी जिले के कामोद गांव में ग्रामीणों ने इसी परंपरा के तहत बुल सिंह आर्य के मकान की छत निर्माण में 10 दिन का काम सिर्फ एक ही दिन में पूरा कर दिया।
10 दिन का काम, एक ही दिन में पूरा
गांववालों ने मिलकर बांस का ढांचा तैयार किया और उस पर खपरैल की टाइलें बिछाईं। पूर्व मंडी सदस्य और बुल सिंह के साढ़ू भाई पारस राम सेनानी ने बताया कि सामान्यतः नींव तैयार करने, लकड़ी के खंभे लगाने और छत बनाने का काम अकेले करने में करीब दस दिन लगते हैं। लेकिन ‘ढास’ परंपरा के कारण पूरा काम एक ही दिन में निपट गया।
शाम को सामूहिक भोज
परंपरा के अनुसार, सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति को काम पूरा होने के बाद शाम को सामूहिक भोज का आयोजन करना होता है। सेनानी ने बताया कि जरूरतमंद व्यक्ति एक दिन पहले गांव में सूचना देता है, जिसके बाद पूरा गांव बिना किसी भेदभाव के मदद के लिए एकत्र हो जाता है।
20 से 100 लोग एक साथ जुटते
कई बार 20 से 100 लोग एक साथ जुट जाते हैं, जिससे सप्ताह भर का कार्य सिर्फ एक दिन में पूरा हो जाता है। मेज़बान की जिम्मेदारी केवल भोजन की व्यवस्था करना होती है, जिसे कई बार गांव के लोग मिलकर तैयार करते हैं।
सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत उदाहरण
धनौरा गांव के एक किसान ने बताया कि उनके मकान की 50×50 वर्गफुट खपरैल छत जर्जर हो गई थी। अकेले होने के कारण वे मरम्मत नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने ‘ढास’ का आयोजन किया और पूरे गांव ने मिलकर सिर्फ एक दिन में छत की मरम्मत कर दी।
आदिवासी संस्कृति एवं परंपराओं के जानकार गजानंद ब्रह्मणे ने बताया कि जो कार्य अकेले 15-20 दिन में करना पड़ता है, वह पूरे गांव के सहयोग से एक-दो दिन में निपट जाता है। इसी तरह सेंधवा क्षेत्र में आग से नष्ट हुए मकान का पुनर्निर्माण भी इस माध्यम से शीघ्र पूरा हुआ।
सामाजिक समरसता और भाईचारे की मिसाल
बड़वानी के इतिहासकार और पूर्व कुलपति डॉ. शिवनारायण यादव के अनुसार, बुवाई के मौसम में यह परंपरा विशेष रूप से लाभकारी होती है। ‘ढास’ जैसी परंपरा आधुनिक यांत्रिकीकरण के दौर में भी सामाजिक समरसता, भाईचारे और साझा जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बनी हुई है। यह परंपरा आदिवासी संस्कृति की गहराई और आपसी सद्भाव की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत करती है।
