
बांग्लादेश के आम चुनाव में पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी को मुंह की खानी पड़ी। उसका सरकार बनाने का सपना चूर-चूर हो गया। जनता ने कट्टरपंथ की जगह बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को दो-तिहाई बहुमत से सत्ता में चुना। इस जीत के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में नए सिरे से मजबूती आने की उम्मीद जगी है, लेकिन चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में बदलाव
बीएनपी के नेतृत्व में भारत के लिए यह व्यावहारिक रणनीतिक विकल्प बन गया है। पार्टी की विचारधारा दक्षिणपंथ के करीब है और इसमें बीजेपी से वैचारिक मेल देखा जा सकता है। बीएनपी के प्रमुख तारिक रहमान ने भी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का भरोसा दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 फरवरी को सोशल मीडिया पर बधाई देते हुए संकेत दिया कि भारत बीएनपी की मजबूत सरकार के साथ फिर से मजबूत संबंध बनाएगा। इस कूटनीतिक कदम से भारत ने चीन और पाकिस्तान के प्रभाव को सीमित करने के लिए रणनीतिक पहल कर दी है।
जमात-ए-इस्लामी का खतरा अभी भी बरकरार
हालांकि, कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव में 76 सीटें जीत ली हैं। ज्यादातर ये भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े जिलों में हैं, जैसे सतखीरा, कुश्तियां, बागेरहाट, रंगपुर, शेरपुर, नवगांव, जॉयपुरहाट और गाइबांधा।
विश्लेषक लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जेएस सोढ़ी का कहना है कि इन सीमावर्ती क्षेत्रों में जमात की मौजूदगी से भारत विरोधी गतिविधियों और घुसपैठ का खतरा अभी भी बना रहेगा। जमात विपक्ष में बैठकर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है, जो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
भारत की रणनीति
इस साल की शुरुआत में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होकर संकेत दिया था कि भारत बीएनपी के साथ संबंध मजबूत करेगा। अब तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार के साथ द्विपक्षीय संपर्क और बढ़ेंगे।
विश्लेषकों का मानना है कि जमात के बिना बीएनपी का नेतृत्व भारत के प्रति अधिक मैत्रीपूर्ण रुख अपनाने में सक्षम हो सकता है। हालांकि, यह दोस्ती शत-प्रतिशत निर्बाध नहीं होगी, बल्कि इसमें राजनीतिक और रणनीतिक समझौते का हिस्सा रहेगा।
निष्कर्ष
बांग्लादेश में बीएनपी की जीत भारत के लिए रणनीतिक जीत है, जिससे चीन-पाकिस्तान के प्रभाव को सीमित करने का अवसर मिलेगा। फिर भी, जमात-ए-इस्लामी का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और सीमावर्ती इलाकों में भारत को सतर्क रहना होगा।
