
पटना: पटना जिले के पश्चिम में स्थित मनेर शरीफ इतिहास, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम है। कभी गंगा, सोन और सरयू नदियों के संगम पर बसा यह नगर आज सूफी परंपरा के एक महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में जाना जाता है। अपने प्रसिद्ध लड्डुओं से लेकर भव्य दरगाहों तक, मनेर सदियों से आस्था और इतिहास का साक्षी रहा है।
मनेर का प्राचीन नाम ‘मनियार मठान’ बताया जाता है, जिसका अर्थ स्थानीय परंपरा में “संगीत नगरी” माना जाता है। समय के साथ सूफी संतों के प्रभाव से यह स्थान आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ और इसके नाम के साथ ‘शरीफ’ जुड़ गया। इतिहासकारों के अनुसार मनेर का उल्लेख मध्यकाल से भी पहले के अभिलेखों में मिलता है।
संगम की भूमि और सामरिक महत्व
प्राचीन काल में मनेर गंगा, सोन और सरयू नदियों के संगम पर स्थित था। उस दौर में नदी मार्ग ही व्यापार और आवागमन की धुरी थे, इसलिए यह क्षेत्र सामरिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। कालांतर में सरयू नदी का प्रवाह बदल गया और वह यहां से विलुप्त हो गई, लेकिन संगम की ऐतिहासिक स्मृति आज भी स्थानीय लोककथाओं में जीवित है।
ईस्वी सन 1124 के एक ताम्रपत्र से संकेत मिलता है कि यह इलाका कभी गढ़वाल राजवंश के अधीन था। उसमें ‘तुरुष्कदंड’ नामक कर का उल्लेख मिलता है, जो बाहरी आक्रमणों से रक्षा के लिए लिया जाता था। मुगल काल में मनेर इस्लामी शिक्षा और सूफी विचारधारा का प्रमुख केंद्र बन गया।
सूफी परंपरा की धड़कन
13वीं शताब्दी में महान सूफी संत हजरत मखदूम याहिया मनेरी के आगमन ने मनेर को नई पहचान दी। वे सुहरावर्दी सिलसिले के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। उनके प्रभाव से मनेर ज्ञान और आध्यात्म का प्रतिष्ठित केंद्र बन गया। उनके पुत्र मखदूम शर्फुद्दीन अहमद यहिया मनेरी ने भी सूफी परंपरा को आगे बढ़ाया और बिहार की आध्यात्मिक धारा को समृद्ध किया।
स्थापत्य का अद्भुत वैभव
मनेर शरीफ की पहचान उसकी ऐतिहासिक दरगाहों से भी जुड़ी है। हजरत मखदूम याहिया मनेरी की मजार श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां दूर-दूर से लोग मन्नतें मांगने आते हैं।
शाह दौलत का मकबरा, जिसे ‘छोटी दरगाह’ के नाम से जाना जाता है, 1616 ईस्वी में बिहार के तत्कालीन गवर्नर इब्राहिम खान ने बनवाया था। चुनार के लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह स्मारक अपनी बारीक नक्काशी, भव्य गुम्बद और कुरान की आयतों से सजी दीवारों के लिए प्रसिद्ध है। दरगाह के सामने स्थित पत्थर का विशाल तालाब उस समय की उन्नत जल संरचना का प्रमाण देता है।
आज मनेर शरीफ इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रतीक है—जहां नदी का बदला हुआ प्रवाह भले दिखता हो, लेकिन आध्यात्मिक परंपरा की धारा अब भी अविरल बह रही है।