
नई दिल्ली।
पति-पत्नी के बीच हुए विवाद के दौरान गुस्से में कहे गए शब्द ‘जाकर मर जाओ’ को आत्महत्या के लिए उकसावा मानने से केरल हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल ऐसे शब्द कह देना अपने-आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत अपराध नहीं बनाता। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरोपी की मंशा क्या थी, न कि मृतक ने उन शब्दों को कैसे लिया।
न्यायमूर्ति सी. प्रदीप कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि झगड़े के दौरान आवेश या गुस्से में बोले गए शब्द, यदि आत्महत्या के लिए उकसाने की स्पष्ट नीयत से न कहे गए हों, तो उन्हें आपराधिक उकसावा नहीं माना जा सकता।
आरोपी को बरी किया
हाई कोर्ट ने कासरगोड जिले के बारा निवासी सफवान अधुर को बरी कर दिया। निचली अदालत ने उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 204 (साक्ष्य नष्ट करना) के तहत आरोप तय किए थे। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के इस आदेश को पलट दिया।
क्या था मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी के एक विवाहित महिला से कथित संबंध थे। जब महिला को यह पता चला कि वह किसी अन्य महिला से विवाह करने की योजना बना रहा है, तो दोनों के बीच तीखी बहस हुई। इसी दौरान आरोपी ने कथित तौर पर महिला से कहा— “चली जा और मर जा”।
इसके बाद 15 सितंबर 2023 को महिला और उसकी साढ़े पांच वर्षीय बेटी ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
अदालत की अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह साबित नहीं होता कि आरोपी का उद्देश्य महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करना था। अदालत ने टिप्पणी की कि
“मौखिक बहस के दौरान आवेश में कहे गए शब्दों को, जब तक उनके पीछे आत्महत्या के लिए उकसाने की स्पष्ट मंशा न हो, धारा 306 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि जब धारा 306 के तहत अपराध नहीं बनता, तो धारा 204 के तहत साक्ष्य नष्ट करने का आरोप भी स्वतः समाप्त हो जाता है।
यह फैसला आत्महत्या से जुड़े मामलों में आरोपी की नीयत और परिस्थितियों के सूक्ष्म मूल्यांकन को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जा रहा है।