Thursday, January 29

सुर-ताल की विरासत को सहेजता उत्तर प्रदेश लुप्तप्राय हो रहे 200 से अधिक पारंपरिक वाद्य यंत्रों का हो रहा संरक्षण

लखनऊ।
आधुनिक संगीत और डिजिटल धुनों के बढ़ते प्रभाव के बीच देश की जनजातीय और लोक संस्कृति से जुड़े पारंपरिक वाद्य यंत्र तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश का लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान इन अनमोल धरोहरों को बचाने और संजोने का सराहनीय कार्य कर रहा है। संस्थान द्वारा प्रदेश और देश की विभिन्न जनजातियों से जुड़े 200 से अधिक लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों का संरक्षण किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सकें।

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जंगलों और पहाड़ों की धुनें हो रही थीं खामोश

प्रदेश के जंगलों, पहाड़ों और नदियों के किनारे कभी गूंजने वाली ढोलक, नगाड़ा, डफ, ढफली और बीन जैसी धुनें आज विलुप्ति के कगार पर हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिशा-निर्देशों के तहत लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों को न केवल संरक्षित कर रहा है, बल्कि उन्हें दोबारा जनमानस के सामने लाने के लिए प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक आयोजनों का भी आयोजन कर रहा है।

 

जनजातीय लोकजीवन की पहचान हैं ये वाद्य यंत्र

उत्तर प्रदेश की गोंड, थारू, बुक्सा, खरवार, सहरिया, बैगा, अगरिया, चेरो और माहीगीर जैसी जनजातियों के लोकजीवन में संगीत की अहम भूमिका रही है।
मंजीरा, चिमटा, खड़ताल और घुंघरुओं की खनक, बांसुरी, बीन और सारंगी की सुरमयी धुनें इन समुदायों की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रही हैं। संस्थान इन सभी वाद्य यंत्रों को संरक्षित कर लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।

 

ताल, सुर और लय—तीनों का संरक्षण

संरक्षित किए जा रहे वाद्य यंत्रों में

  • ताल वाद्य: ढोलक, नगाड़ा, डफ, ढफली, डमरू, ढक और थाली
  • सुर वाद्य: बांसुरी, बीन और सारंगी
  • लय वाद्य: मंजीरा, चिमटा, घुंघरू और खड़ताल
    शामिल हैं।
    कुल मिलाकर संस्थान के पास अब 200 से अधिक ऐसे पारंपरिक वाद्य यंत्र सुरक्षित हैं, जो कभी विलुप्त होने की कगार पर थे।

 

प्रदर्शनियों के जरिए जनता से जुड़ाव

इन वाद्य यंत्रों को आमजन तक पहुंचाने के लिए कला कुंभ, कला गांव और जनजातीय महोत्सवों में विशेष प्रदर्शनियां आयोजित की गईं।
प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ के अवसर पर कला कुंभ में लगी प्रदर्शनी को देश-विदेश से आए पर्यटकों और कला प्रेमियों ने खूब सराहा। वहीं यूपी दिवस पर कला गांव में आयोजित प्रदर्शनी ने युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम किया।

 

नई पीढ़ी तक पहुंच रही पुरानी विरासत

जनजातीय गौरव बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर आयोजित जनजातीय भागीदारी महोत्सव में जब पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई दी, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह पहल केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि खोती हुई सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है।

 

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