
जयपुर: राजस्थान में एनसीपी को मजबूत करने के लिए शरद पवार ने कई बार कोशिश की, लेकिन पार्टी को कांग्रेस की सहयोगी समझा गया और वोटरों ने इसे नकार दिया। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान में एनसीपी के कमजोर होने के पीछे तीन बड़ी वजहें थीं।
- कोर वोटर से कनेक्ट की कमी:
राजस्थान में पार्टी ने यह तय नहीं किया कि वह किस वर्ग की प्रतिनिधि बनेगी। न किसान, न दलित, न OBC या अल्पसंख्यक – किसी भी समूह पर स्पष्ट केंद्रित रणनीति न होने से आम वोटरों के मन में सवाल पैदा हो गया कि एनसीपी आखिर किसके लिए है। - जमीन पर संगठन की कमजोरी:
बीएसपी ने अपने बूथ स्तर तक संगठन खड़ा किया, स्थानीय चेहरे और कैडर बनाए, जबकि एनसीपी केवल चुनावी मौसम तक सक्रिय रही। राजस्थान जैसे बड़े राज्य में स्थायी संगठन न होने के कारण पार्टी टिक नहीं पाई। - कांग्रेस की परछाईं से बाहर नहीं निकली:
एनसीपी की पहचान महाराष्ट्र के बाहर अक्सर कांग्रेस की B-Team के रूप में रही। राजस्थान में जहां कांग्रेस पहले से मजबूत है, वहां एनसीपी खुद को एक अलग विकल्प के रूप में पेश नहीं कर पाई। जबकि बीएसपी ने हमेशा कांग्रेस और बीजेपी दोनों से अलग तीसरे विकल्प के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
अजित पवार का अधूरा सपना:
अजित पवार को 2024 में एनसीपी की आधिकारिक कमान मिली थी। उनका उद्देश्य पार्टी को राष्ट्रीय दर्जा दिलाना और अन्य राज्यों में पैर जमाना था। बिहार विधानसभा चुनाव में हाथ आजमाने के बावजूद पार्टी को सफलता नहीं मिली। विशेषज्ञों के अनुसार यह कमजोर तैयारी और चुनावी रणनीति का नतीजा था।
राजस्थान में एनसीपी की स्थिति आज भी कमजोर है, जबकि बीएसपी और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां धीरे-धीरे अपने वोट बैंक के सहारे राज्य में पैठ बना रही हैं।