
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों (अनुच्छेद 142) का प्रयोग करते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर अगले आदेश तक अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस, रेगुलेशंस 2012’ को अस्थायी रूप से फिर से लागू करने का निर्देश दिया है।
क्यों लगाई गई नए नियमों पर रोक
शीर्ष अदालत ने कहा कि यूजीसी के नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा (क्लॉज 3C) स्पष्ट नहीं है। इस अस्पष्टता के कारण भविष्य में इन प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने 2012 के पुराने नियमों को अंतरिम रूप से प्रभावी रखने का फैसला किया।
क्या है यूजीसी का 2012 का नियम
यूजीसी ने 17 सितंबर 2012 को देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने और भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ये नियम जारी किए थे। इसके तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अपने परिसर में इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेल (EOC) गठित करने की सलाह दी गई थी।
ईओसी का उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) छात्रों की शिकायतों को सुनना और समान अवसर का वातावरण सुनिश्चित करना था।
हालांकि, यह प्रावधान अनिवार्य नहीं, बल्कि केवल सलाह (Advisory) के रूप में था।
किन वर्गों तक सीमित थे नियम
2012 के नियम मुख्य रूप से SC और ST छात्रों के लिए बनाए गए थे। उस समय OBC वर्ग को इसमें शामिल नहीं किया गया था।
हालांकि, यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशंस 2026 में OBC को भी शामिल किया गया है, जिससे यह विषय और अधिक विवादास्पद हो गया।
शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में OBC, SC और ST छात्र मिलकर उच्च शिक्षा में कुल नामांकन का लगभग 61% हैं।
शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया
2012 के नियमों के अनुसार—
ईओसी को छात्रों के साथ होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव, बहिष्कार या उत्पीड़न की शिकायत सुनने की जिम्मेदारी दी गई थी।
भेदभाव के आधारों में जाति, धर्म, भाषा, लिंग और दिव्यांगता शामिल थे।
शिकायत छात्र स्वयं या उसके माता-पिता लिखित रूप में कर सकते थे, चाहे घटना संस्थान के भीतर हुई हो या बाहर।
शिकायत एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर को दी जाती थी।
संस्थानों को शिकायत निपटान की पारदर्शी प्रक्रिया बनाकर अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने की सलाह दी गई थी।
दंड और कार्रवाई से जुड़े प्रावधान
2012 के नियम कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं थे।
ईओसी केवल शिकायत सुन सकता था, दंड देना अनिवार्य नहीं था।
जांच के बाद संस्थान, छात्रों के लिए यूजीसी के अन्य नियमों और कर्मचारियों के लिए सर्विस रूल्स के अनुसार कार्रवाई कर सकता था।
ईओसी का गठन और शिकायतों पर कार्रवाई पूरी तरह से संस्थान की इच्छा पर निर्भर थी।
नियमों में स्पष्ट दंड प्रावधान नहीं थे।
अपील का अधिकार
यदि कोई व्यक्ति एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर के आदेश से असंतुष्ट होता है, तो—
वह आदेश की तारीख से 90 दिनों के भीतर उच्च शिक्षण संस्थान के प्रमुख के पास अपील कर सकता है।
विशेष परिस्थितियों में, संस्थान प्रमुख 90 दिनों के बाद भी अपील पर विचार कर सकता है।