


जापान के हिरोशिमा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा उपकरण विकसित किया है, जो स्मार्टफोन को पोर्टेबल रेडिएशन डिटेक्टर में बदल देता है। यह तकनीक परमाणु या रेडियोलॉजिकल घटनाओं के तुरंत बाद विकिरण का असर मापने में मदद करेगी।
कैसे काम करता है सिस्टम?
इस डिवाइस में रेडियोक्रोमिक फिल्म और स्मार्टफोन कैमरा जोड़ा गया है। फिल्म विकिरण के संपर्क में आने पर तुरंत रंग बदलती है, जिसे आंखों से देखा जा सकता है। इसके बाद स्मार्टफोन कैमरे से फिल्म की तस्वीर खींचकर मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए डोज यानी विकिरण की मात्रा का विश्लेषण किया जाता है। रिसर्चर्स ने बताया कि यह सिस्टम 10 ग्रे तक की डोज माप सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?
हिरोशिमा विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट फॉर रेडिएशन बायोलॉजी एंड मेडिसिन के प्रोफेसर हिरोशी यासुदा के अनुसार, बड़े पैमाने पर परमाणु या रेडियोलॉजिकल घटनाओं के बाद लोगों पर रेडिएशन के असर को तुरंत जानना और चिकित्सा कार्रवाई करना जरूरी है। यह प्रणाली खासकर उन परिस्थितियों में कारगर है, जहां पारंपरिक लैब-बेस्ड तरीके धीमे, महंगे या पहुँच से बाहर हों।
सस्ता और भरोसेमंद विकल्प
इस पोर्टेबल डिटेक्टर की कुल लागत केवल 70 अमेरिकी डॉलर (लगभग 6,423 रुपये) से कम है, जिससे यह पारंपरिक डोसीमेट्री उपकरणों की तुलना में बेहद सस्ता साबित होता है। सैमसंग और आईफोन समेत विभिन्न स्मार्टफोन मॉडल्स पर इसका परीक्षण किया गया और लगातार भरोसेमंद परिणाम मिले।
यह तकनीक जापान के बढ़ते ऊर्जा उपयोग और परमाणु ऊर्जा को अपनाने के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। हिरोशिमा, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम का शिकार हुआ था, अब अपने वैज्ञानिकों की मदद से स्मार्टफोन आधारित सुरक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम कर रहा है।


