
हर साल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। यह दिन न सिर्फ हिंदी भाषा के वैश्विक महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि इससे जुड़ा एक अहम सवाल भी बार-बार सामने आता है—जब हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, तो फिर भारत की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं?
दुनिया में हिंदी का बढ़ता प्रभाव
अंग्रेजी और मैंडरिन चीनी के बाद हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। करोड़ों लोग इसे बोलते, समझते और लिखते हैं। भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एंड टोबैगो समेत कई देशों में हिंदी या उससे जुड़ी भाषाएं प्रचलित हैं।
क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है?
इस सवाल का सीधा जवाब है—नहीं।
हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है। यह एक आम भ्रांति है, जो अक्सर जनरल नॉलेज और सार्वजनिक चर्चाओं में देखने को मिलती है।
भारत का संविधान किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं करता। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की भाषाई विविधता है। देश में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। ऐसे में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित करना अन्य भाषाओं के साथ अन्याय माना गया।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान के भाग-17 के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार—
“हिंदी, देवनागरी लिपि में, भारत की राजभाषा होगी।”
यानी हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला है, न कि राष्ट्रभाषा का।
आजादी के बाद सरकारी कामकाज में हिंदी को लागू करने के लिए 15 वर्षों की समय-सीमा तय की गई थी, लेकिन व्यावहारिक कठिनाइयों और भाषाई संतुलन को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजी का उपयोग भी जारी रखा गया। बाद में संविधान की आठवीं अनुसूची में कई अन्य भारतीय भाषाओं को भी मान्यता दी गई।
हिंदी भाषा से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला
स्वतंत्रता के बाद भाषा नीति तय करने की जिम्मेदारी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और नरसिंह गोपालस्वामी अयंगर को दी गई। इस समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर थे।
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। इसी उपलक्ष्य में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।
10 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है विश्व हिंदी दिवस?
10 जनवरी 1975 को हिंदी के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 30 से अधिक देशों के हिंदी विद्वानों ने भाग लिया।
इस सम्मेलन का उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना था। इसमें विदेशों में हिंदी शिक्षण, शोध संस्थानों की स्थापना और वैश्विक मंचों पर हिंदी के प्रचार-प्रसार पर सहमति बनी।
इसी ऐतिहासिक दिन की स्मृति में वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।
निष्कर्ष
हिंदी भले ही भारत की राष्ट्रभाषा न हो, लेकिन यह देश की सांस्कृतिक आत्मा और वैश्विक पहचान का मजबूत आधार है। विश्व हिंदी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, विचार और आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति भी है।