Monday, June 15

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पाकिस्तान से बातचीत के रास्ते बंद नहीं, तालिबान का सुलह का संकेत — टीटीपी मुद्दे पर बातचीत को तैयार काबुल

 

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अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच तालिबान सरकार की ओर से रिश्ते सुधारने का अहम संकेत मिला है। अफगान तालिबान सरकार के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे अभी बंद नहीं हुए हैं और मौजूदा विवादों को संवाद के जरिए सुलझाया जा सकता है।

 

शुक्रवार को काबुल में दिए गए बयान में हक्कानी ने कहा कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “अगर किसी को इस बारे में कोई शक या गलतफहमी है, तो हम उसे दूर करने के लिए तैयार हैं। अफगानिस्तान किसी भी देश या क्षेत्र के लिए खतरा नहीं है।”

हालांकि उन्होंने पाकिस्तान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ तौर पर इस्लामाबाद की ओर माना जा रहा है।

 

सीमा तनाव और ठप व्यापार के बीच सुलह का संदेश

 

डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, हक्कानी के इस बयान से दोनों देशों के रिश्तों में नरमी की उम्मीद जगी है। बीते कुछ महीनों में अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर कई बार गोलीबारी की घटनाएं हुई हैं। अक्टूबर में पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के भीतर किए गए हवाई हमलों के बाद हालात और बिगड़ गए थे। इसके चलते पिछले दो महीनों से दोनों देशों के बीच व्यापार भी काफी हद तक ठप पड़ा है।

 

टीटीपी मुद्दे पर अहम संकेत

 

हक्कानी का बयान खासतौर पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि टीटीपी अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले कर रही है।

तालिबान सरकार ने दोहराया कि वह दोहा समझौते का पालन कर रही है और किसी भी सशस्त्र समूह को अफगान जमीन से दूसरे देशों के खिलाफ गतिविधियां करने की इजाजत नहीं दी जा रही।

 

हक्कानी ने कहा, “तालिबान नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय समुदाय के अविश्वास और गलतफहमियों को दूर करने के लिए उचित और स्थायी समाधान खोजने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा मुद्दों को सुलझाने के लिए बातचीत के रास्ते खुले हैं और हम शांति की ओर बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

 

पाकिस्तान की मांग और अटका विवाद

 

पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान से टीटीपी पर सख्त कार्रवाई और लिखित गारंटी की मांग करता रहा है। हालांकि तालिबान इस तरह के किसी लिखित वादे पर सहमत नहीं हुआ है। यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्ते पटरी पर नहीं लौट पा रहे हैं।

 

मध्यस्थता की कोशिशें नाकाम

 

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव कम कराने के लिए तुर्की, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने मध्यस्थता की कोशिशें की थीं, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है।

 

हालांकि, तालिबान की ओर से आए इस ताजा बयान को दोनों पड़ोसी देशों के बीच जमी बर्फ पिघलने की संभावित शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या इस संकेत के बाद काबुल और इस्लामाबाद के बीच औपचारिक बातचीत की शुरुआत होती है या नहीं।

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