Friday, May 15

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अरावली पर ‘100 मीटर’ विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, याचिका स्वीकार; पर्यावरणीय खतरे की चेतावनी

 

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नई दिल्ली: अरावली पर्वतमाला को खनन के उद्देश्य से परिभाषित करने के लिए अपनाए गए 100 मीटर ऊंचाई के मानदंड पर उठे विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने इस मानदंड के खिलाफ दायर याचिका को स्वीकार कर लिया है और केंद्र सरकार समेत संबंधित राज्यों से जवाब मांगा है।

 

यह याचिका हरियाणा के पूर्व वन संरक्षक आर.पी. बलवान ने दायर की है। इससे पहले 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की समिति की सिफारिश को स्वीकार करते हुए खनन के मामलों में अरावली पहाड़ियों के लिए 100 मीटर ऊंचाई को एक समान परिभाषा के रूप में अपनाया था।

 

क्या है 100 मीटर का विवाद

 

MoEFCC की समिति ने सुझाव दिया था कि स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाए। समिति का तर्क था कि इससे खनन को लेकर एकरूपता आएगी। लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि इस परिभाषा से 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली हजारों पहाड़ियां अरावली के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिससे उन्हें कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा।

 

याचिकाकर्ता की चेतावनी

 

आर.पी. बलवान ने कहा कि अरावली कोई साधारण पहाड़ी श्रृंखला नहीं, बल्कि गुजरात से दिल्ली तक फैली एक विशाल पारिस्थितिक ढाल है, जो थार रेगिस्तान को उत्तर भारत की ओर बढ़ने से रोकती है। उन्होंने चेताया कि 100 मीटर का पैमाना लागू होने से राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर-पश्चिमी भारत के पर्यावरण पर दूरगामी और गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।

 

बलवान का यह भी कहना है कि MoEFCC के हलफनामे में विरोधाभास हैं। उन्होंने बताया कि वन सर्वेक्षण द्वारा सुझाई गई 3-डिग्री ढलान आधारित परिभाषा, जो अधिक वैज्ञानिक मानी जाती है, उसे नजरअंदाज किया गया।

 

सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

 

17 दिसंबर के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, हरियाणा और राजस्थान सरकारों तथा MoEFCC से याचिका पर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट के चर्चित टी.एन. गोदावरमन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ केस से जुड़ा है, जिसमें 1996 में कोर्ट ने ‘वन’ की परिभाषा को व्यापक रूप दिया था।

 

केंद्र सरकार का पक्ष

 

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा है कि 100 मीटर नियम को लेकर हो रहा विरोध गलतफहमी और गलत व्याख्या पर आधारित है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक अरावली में टिकाऊ खनन के लिए समग्र प्रबंधन योजना तैयार नहीं हो जाती, तब तक कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जाएगा।

 

पहले भी खनन पर सख्ती

 

सुप्रीम कोर्ट पहले ही गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह जैसे इलाकों में अरावली क्षेत्र में खनन पर सख्त प्रतिबंध लगा चुका है। कोर्ट का स्पष्ट मत रहा है कि अनियंत्रित खनन से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अपरिवर्तनीय होता है।

 

आगे क्या

 

अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर नजरें टिकी हैं। यह फैसला तय करेगा कि अरावली को केवल ऊंचाई के आधार पर परिभाषित किया जाएगा या इसके पारिस्थितिक महत्व को केंद्र में रखकर अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।

 

 

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