Saturday, January 10

83 पैसे का रोबोट, जिसे देखने के लिए चाहिए माइक्रोस्कोप: भविष्य की रोबोटिक्स में क्रांतिकारी कदम

नई दिल्ली। विज्ञान और तकनीक की दुनिया में एक ऐसी उपलब्धि सामने आई है, जो आने वाले समय में रोबोटिक्स और मेडिकल टेक्नोलॉजी की दिशा बदल सकती है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया और यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के वैज्ञानिकों ने मिलकर दुनिया के सबसे छोटे ऑटोनॉमस (स्वतंत्र) रोबोट विकसित किए हैं। इन रोबोटों को नंगी आंखों से देख पाना संभव नहीं है—इन्हें देखने के लिए माइक्रोस्कोप की जरूरत पड़ती है।

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आश्चर्य की बात यह है कि एक ऐसे रोबोट की कीमत महज 1 अमेरिकी सेंट, यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 83 पैसे है। आकार में ये इंसान की कोशिकाओं जितने छोटे हैं, लेकिन क्षमताओं के मामले में बड़े-बड़े रोबोटों को चुनौती देते हैं।

क्या है इन माइक्रो रोबोटों की खासियत?

रिसर्च जर्नल Science Robotics और Proceedings of the National Academy of Sciences (PNAS) में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, ये दुनिया के पहले ऐसे प्रोग्रामेबल रोबोट हैं, जो इतने छोटे आकार में भी अपने दम पर काम कर सकते हैं।
ये रोबोट

  • पानी में तैर सकते हैं
  • आसपास के तापमान और वातावरण को महसूस कर सकते हैं
  • परिस्थितियों के अनुसार अपनी दिशा और व्यवहार बदल सकते हैं
  • महीनों तक लगातार काम करने की क्षमता रखते हैं

किस काम आएंगे ये रोबोट?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन माइक्रो रोबोटों को खासतौर पर मेडिकल और बायोलॉजिकल रिसर्च के लिए विकसित किया गया है। भविष्य में इनका इस्तेमाल—

  • कोशिकाओं की निगरानी
  • शरीर के भीतर होने वाले सूक्ष्म बदलावों को समझने
  • नई मेडिकल डिवाइस और तकनीकों के विकास
  • अत्यंत छोटी और संवेदनशील जगहों पर रिसर्च
    में किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने क्या कहा?

इस रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिक मार्क मिस्किन का कहना है कि यह उपलब्धि रोबोटिक्स की दुनिया में एक बिल्कुल नई दिशा खोलती है। उन्होंने बताया कि पिछले करीब 40 वर्षों से वैज्ञानिक यह चुनौती झेल रहे थे कि 1 मिलीमीटर से भी छोटे रोबोट कैसे बनाए जाएं। यह रिसर्च उस समस्या का बड़ा समाधान है।
उन्होंने कहा, “हमने ऐसे ऑटोनॉमस रोबोट बनाए हैं, जो आकार में 10 हजार गुना छोटे हैं, लेकिन फिर भी पूरी तरह प्रोग्रामेबल और स्वतंत्र हैं।”

इतनी कम बिजली में कैसे करते हैं काम?

इन रोबोटों में बेहद छोटे सोलर पैनल लगाए गए हैं, जो सिर्फ 75 नैनोवॉट बिजली पैदा करते हैं। यह किसी स्मार्टवॉच की बिजली खपत से लगभग एक लाख गुना कम है।
इतनी कम ऊर्जा में काम करने के लिए वैज्ञानिकों ने

  • अल्ट्रा-लो वोल्टेज सर्किट
  • बेहद सूक्ष्म प्रोसेसर
  • मेमोरी और सेंसर
    को एक ही सिस्टम में फिट किया है। यही कारण है कि ये रोबोट पूरी तरह ऑटोनॉमस हैं।

भविष्य की तकनीक का संकेत

हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि ये रोबोट बाजार में कब या आएंगे भी या नहीं, लेकिन वैज्ञानिक इसे भविष्य की तकनीक की नींव मान रहे हैं। उनका कहना है कि इस रिसर्च से ऐसे और भी छोटे, स्मार्ट और एडवांस रोबोट बनाने का रास्ता खुलेगा, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकेंगे।

निष्कर्ष:
83 पैसे का यह माइक्रो रोबोट सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि आने वाले समय में मेडिकल, रिसर्च और रोबोटिक्स की दुनिया में बड़े बदलाव का संकेत है—जहां आंखों से न दिखने वाली तकनीक, इंसान की सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान बन सकती है।

 

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