
नई दिल्ली: देश की लाइफलाइन कही जाने वाली रेलवे में बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। इस क्रम में अब रेल कर्मचारियों की यूनिफॉर्म में भी बदलाव होगा। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शुक्रवार को कहा कि रेलवे में अब अंग्रेजों के जमाने का बंदगला वाला काला कोट कर्मचारियों की फॉर्मल ड्रेस का हिस्सा नहीं रहेगा। उन्होंने कहा, “हमें हर उस चीज को हटाना है जो गुलामी की निशानी है। हमारी सोच और काम करने के तरीके से लेकर पहनावे तक, हर जगह से पुरानी प्रथाओं को हटाना होगा।”
पुरानी रीतियों पर भी रोक
रेलवे की यूनिफॉर्म में बदलाव केवल शुरुआत है। सरकार अब उन पुरानी प्रथाओं और पहनावों की पहचान कर रही है जो अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही हैं। इसमें विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में पहने जाने वाले गाउन और टोपी, अफसरों का बंद गले वाला कोट, और कुछ राज्यों में कलेक्टर या मेयर के साथ काम करने वाले कर्मचारियों की खास वर्दी शामिल है।
भारतीय संस्कृति को प्राथमिकता
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मंत्रियों और बड़े अफसरों को निर्देश दिया है कि वे पुरानी प्रथाओं की पहचान करें और उनकी जगह भारतीय संस्कृति को दर्शाने वाले नए विकल्प सुझाएँ। कुछ संस्थानों में गाउन और टोपी पहनने का चलन धीरे-धीरे कम हो रहा है, क्योंकि यह भारत की गर्म और उमस भरी जलवायु के लिए उपयुक्त नहीं है।
काले कोट और वकीलों का गाउन भी बदलाव के दायरे में
सूत्रों का कहना है कि वकीलों द्वारा पहने जाने वाले काले कोट और गाउन को भी बदलने पर विचार किया जा सकता है। यह पहनावा अंग्रेजों के कानूनी सिस्टम से लिया गया था और अधिकार, सम्मान तथा न्याय के प्रतीक के रूप में देखा जाता था।
रेलवे के इस बदलाव से न केवल कर्मचारियों का पहनावा आधुनिक होगा, बल्कि यह देश में गुलामी की पुरानी निशानों को हटाने की दिशा में एक बड़ा कदम भी साबित होगा।