
श्रीगंगानगर, 24 फरवरी 2026: राजस्थान की वामपंथी राजनीति के स्तंभ और पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। संगरिया से 1990 में विधायक रहे बेनीवाल को किसान-मजदूर आंदोलनों का ‘भीष्म पितामह’ कहा जाता था। उनके जाने से प्रदेश ने एक बेबाक, सादगीप्रिय और जनता के लिए लड़ने वाले रणनीतिकार को खो दिया।
13 अक्टूबर 1932 – 2026: एक अजेय यात्रा
हेतराम बेनीवाल का जन्म 13 अक्टूबर 1932 को हुआ। उन्होंने राजस्थान की राजनीति में वामपंथी विचारधारा अपनाई, जब रजवाड़ों और रसूखदारों का बोलबाला था। 1967 में संगरिया विधानसभा क्षेत्र से माकपा के टिकट पर उनका पहला चुनावी प्रयास सफल रहा। हालांकि उन्हें असली पहचान 1990-91 में मिली, जब वे संगरिया से विधायक चुने गए। भले ही उनका कार्यकाल केवल ढाई साल का रहा, लेकिन विधानसभा में उनका प्रभाव और व्यक्तित्व आज भी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
बिना माइक के गरजती आवाज
बेनीवाल की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी और बुलंद आवाज थी। कार्यकर्ताओं के अनुसार, उनकी आवाज इतनी प्रखर थी कि उन्हें हजारों लोगों को संबोधित करने के लिए किसी लाउडस्पीकर या माइक की जरूरत नहीं पड़ती थी। सदन में उनका एक वाकया इस बात का जीवंत उदाहरण है: भारी शोरगुल के बीच उन्होंने तत्कालीन अध्यक्ष हरिशंकर भाभड़ा से कहा, “पहले इन्हें चुप कराइए, तब बोलूंगा।” अध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए कहा था, “आप अपने स्वभाव में बोलिए, ये खुद चुप हो जाएंगे।”
आंदोलनों के ‘मसीहा’ और रणनीतिकार
हेतराम बेनीवाल केवल विधायक नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े रणनीतिकार थे। उन्होंने राजस्थान के कई ऐतिहासिक आंदोलनों का नेतृत्व किया:
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घड़साना किसान आंदोलन (2004-06): पानी की मांग को लेकर किसानों को गांव-गांव जाकर संगठित किया।
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जमीन आवंटन और मजदूर संघर्ष: राजस्थान कैनाल और जेसीटी मिल मजदूर आंदोलनों में अग्रिम पंक्ति में रहे।
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भाखड़ा और गंगनहर: सिंचाई पानी के अधिकारों के लिए जेल यात्राएं और आंदोलनों में हिस्सा लिया।
उनकी संगठन क्षमता ऐसी थी कि उनके आह्वान पर प्रशासन पहले ही अलर्ट मोड में आ जाता। बेनीवाल की एक आवाज पर हजारों किसान सड़कों पर उतरने को तैयार रहते थे।
सादगी और स्पष्टवादिता का अंत
हाल के वर्षों में उनकी पत्नी चंद्रावली देवी के निधन के बाद वे थोड़े एकाकी हो गए थे। लेकिन 94 साल की उम्र में भी उनका हौसला कम नहीं हुआ। कुछ दिन पहले हीमोग्लोबिन की कमी के कारण अस्पताल में भर्ती हुए, लेकिन निमोनिया संक्रमण ने इस ‘जनता के सिपाही’ को हमसे छीन लिया।
उनकी अंतिम यात्रा मंगलवार को पैतृक गांव 8 एलएनपी में निकलेगी, जहां न केवल उनके परिजन बल्कि राजस्थान का हर किसान और मजदूर खड़ा होगा, जिसे उन्होंने संघर्ष करना और लड़ना सिखाया।
हेतराम बेनीवाल राजस्थान के किसानों और मजदूरों के लिए हमेशा प्रेरणा बने रहेंगे।
