Monday, May 25

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सिंगल मदर के बच्चे पर पिता की जाति थोपना गलत, बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिंगल मदर से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि जिस बच्ची का पालन-पोषण केवल उसकी मां ने किया हो, उसे जबरन पिता का नाम, उपनाम या जाति धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

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हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान पर पिता की जाति थोपना पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देता है और यह संविधान द्वारा दिए गए सम्मान व समानता के अधिकार के विरुद्ध है।

यह फैसला 12 वर्षीय बच्ची द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें उसने अपने स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज नाम और जाति प्रविष्टि को बदलने की अनुमति मांगी थी। बच्ची ने स्कूल रिकॉर्ड में अपनी जाति ‘मराठा’ के स्थान पर ‘अनुसूचित जाति’ दर्ज करने की मांग की थी।

स्कूल ने नियमों का हवाला देकर किया था इनकार

मामले में स्कूल प्रशासन ने माध्यमिक विद्यालय संहिता का हवाला देते हुए बच्ची के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद बच्ची और उसकी मां ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट का सख्त संदेश: यह दान नहीं, संवैधानिक निष्ठा है

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और एच. एस. वेनेगांवकर ने 2 फरवरी को दिए गए फैसले में कहा कि एकल मां को बच्चे की पूर्ण अभिभावक मानना कोई कृपा या दान नहीं, बल्कि संविधान के प्रति निष्ठा है।

अदालत ने कहा कि समाज को यह स्वीकार करना होगा कि बच्चे की पहचान केवल उस पिता से जोड़ना उचित नहीं है, जो उसके जीवन में मौजूद ही नहीं है।

‘राज्य के नियम नैतिक निर्णय नहीं बनने चाहिए’

कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि एक विकसित समाज यह नहीं कह सकता कि बच्चे की सार्वजनिक पहचान केवल पिता से ही जुड़ी हो। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य के नियम नैतिक निर्णय का साधन नहीं बनने चाहिए, बल्कि कल्याण का सटीक माध्यम बनने चाहिए।

स्कूल रिकॉर्ड को बताया सार्वजनिक दस्तावेज

हाई कोर्ट ने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड कोई निजी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक दस्तावेज होता है, जो बच्चे के जीवन में वर्षों तक साथ चलता है और भविष्य में कई संस्थानों तथा पेशेवर क्षेत्र में भी उसकी पहचान बनता है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि बच्ची की वास्तविक अभिभावक केवल मां है, तो स्कूल रिकॉर्ड में पिता की उपस्थिति को अनिवार्य रूप से दर्शाना प्रशासनिक निष्पक्षता नहीं कही जा सकती।

क्या है पूरा मामला

मामले में बच्ची की मां ने पिता पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। बाद में दोनों पक्षों में समझौता हो गया और तय हुआ कि बच्ची की स्थायी कस्टडी मां के पास रहेगी।

याचिका में मां और बच्ची ने अदालत से कहा कि स्कूल रिकॉर्ड में पिता का उपनाम बने रहना न केवल गलत है, बल्कि बच्ची के लिए सामाजिक रूप से असुरक्षा और मानसिक दबाव का कारण भी बन सकता है।

फैसले को बताया सामाजिक बदलाव की दिशा में बड़ा कदम

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी संकेत दिया कि यह निर्णय समाज को वंश को भाग्य मानने से हटाकर गरिमा को अधिकार मानने की दिशा में आगे ले जाता है।

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