
नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी से प्रगति ने दुनिया में यह बहस तेज कर दी है कि इंसान और AI में से कौन बेहतर है। इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 के मौके पर इस विषय पर विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की चर्चा हुई।
AI की ताकत
आज के लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) और जेनरेटिव सिस्टम कई क्षेत्रों में प्रभावशाली काम कर सकते हैं। AI निबंध लिख सकता है, अनुवाद कर सकता है, कंप्यूटर कोड तैयार कर सकता है, बीमारियों का निदान कर सकता है और संगीत रच सकता है। मशीनें कुछ कार्यों में इंसानों से बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
सीमित बुद्धिमत्ता
लेकिन सवाल यह है कि क्या AI असली मानव बुद्धि के करीब पहुंचा है। इंसानी बुद्धि सिर्फ परीक्षा या टास्क पास करने तक सीमित नहीं है। मानव बुद्धि सामाजिक और अनुभवजन्य है। किसी खोज या कला में इंसानी योगदान हमेशा सामूहिक प्रयास, अनुभव और सांस्कृतिक ज्ञान का परिणाम होता है।
नैतिकता और समझ का अंतर
AI के पास असली अनुभव, भावनाएं और नैतिक समझ नहीं होती। वह केवल डेटा के पैटर्न से सीखता है और गणना करता है। उसे डर, खुशी या सहानुभूति का अनुभव नहीं होता। इंसान का सही-गलत का निर्णय इतिहास, संस्कृति और सामाजिक संदर्भ पर आधारित होता है।
सीमित डेटा और सांस्कृतिक विविधता
AI जिस डेटा पर आधारित है, वह मानव अनुभव का केवल एक छोटा हिस्सा है। इंटरनेट की सामग्री मुख्य रूप से कुछ प्रमुख भाषाओं और संस्कृतियों तक सीमित है। जबकि इंसानी बुद्धि सात अरब से अधिक लोगों के जीवन अनुभवों और सांस्कृतिक विविधता से विकसित होती है।
असली खतरा
लेखिका ने चेताया है कि AI का खतरा यह नहीं कि वह इंसानों से आगे निकल जाएगा, बल्कि यह कि इस बहाने असली सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से ध्यान हट सकता है। जैसे ऑटोमेटेड सिस्टम में पक्षपात, ताकत का केंद्रीकरण, मजदूरों का विस्थापन और समावेशी तकनीक की आवश्यकता।
निष्कर्ष
AI दुनिया को बदल रहा है और इसकी क्षमता अतुलनीय है, लेकिन इंसानी बुद्धि और समझ का पर्याय नहीं बन सकता। मशीनें हमारी मदद कर सकती हैं, लेकिन मानव निर्णय, नैतिकता और अनुभव के बिना वे समाज में वास्तविक बुद्धिमत्ता नहीं ला सकती।
