
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की 2023 में प्रकाशित ‘लिंग संबंधी रूढ़ियों से निपटने पर हैंडबुक’ को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश एम.के. सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि यह हैंडबुक तकनीकी और हार्वर्ड-केंद्रित है, जो रेप पीड़िता और आम लोगों के लिए समझने में कठिन है।
CJI बोले-पीड़िता और आम लोग नहीं समझ सकते हैं हैंडबुक
पीठ में जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारी ने कहा कि इस हैंडबुक में यौन उत्पीड़न के मामले फोरेंसिक नजरिए से पेश किए गए हैं, जो आम नागरिकों और पीड़ितों के लिए उपयोगी नहीं हैं।
न्यायिक अकादमी को दी जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया कि वे इस मुद्दे पर पुनर्विचार करें और जेंडर संवेदनशीलता से संबंधित दिशानिर्देश तैयार करके रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को प्रस्तुत करें। इसमें एमिकस क्यूरी शोभा गुप्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका जैसी विशेषज्ञ टीम की मदद ली जाएगी।
हैंडबुक का उद्देश्य और CJI की राय
पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने हैंडबुक में महिलाओं के खिलाफ प्रचलित रूढ़ियों की पहचान और उनका वैकल्पिक शब्दावली के माध्यम से समाधान सुझाया था। मगर CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में बैठे जजों को उपदेश देने का कोई लाभ नहीं है। इसके बजाय हाईकोर्ट जजों को अकादमी में ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
हैंडबुक में दिए गए कुछ प्रमुख सुधार
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स्टीरियोटाइप सोच: महिलाएं झूठे आरोप लगाती हैं।
सच्चाई: महिलाओं को रिपोर्ट लिखाने में अक्सर परिवार का समर्थन नहीं मिलता। -
स्टीरियोटाइप सोच: ट्रांसजेंडर लोग सुरक्षित हैं।
सच्चाई: ट्रांसजेंडर से भी रेप हो सकता है। -
स्टीरियोटाइप सोच: महिलाएं भावनात्मक होती हैं।
सच्चाई: किसी का जेंडर उसकी तर्क क्षमता को प्रभावित नहीं करता। -
स्टीरियोटाइप सोच: घर के काम केवल महिलाओं का काम है।
सच्चाई: हर व्यक्ति, चाहे कोई भी जेंडर हो, घर के काम में सक्षम है। -
स्टीरियोटाइप सोच: अनमैरिड महिलाएं फैसले नहीं ले सकतीं।
सच्चाई: शादी का होना निर्णय क्षमता पर असर नहीं डालता।
हाईकोर्ट के फैसले पर रोक
पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च 2025 के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामा की डोरी ढीली करना रेप का प्रयास नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की असंवेदनशीलता पर स्वतः संज्ञान लिया और रोक लगाई थी।
सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई जेंडर संवेदनशीलता को लेकर न्यायिक प्रणाली में व्यावहारिक और समझने योग्य दिशा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
