Wednesday, February 11

चागोस और डिएगो गार्सिया: अमेरिका-ब्रिटेन के सामने खड़ा हुआ भारत, मॉरीशस को मिलेगी भारतीय मदद

नई दिल्ली। हिंद महासागर में स्थित चागोस द्वीपसमूह और उसके सबसे बड़े द्वीप डिएगो गार्सिया को लेकर वैश्विक तनाव बढ़ता जा रहा है। डिएगो गार्सिया में अमेरिका का सैन्य बेस है, जबकि चागोस पर अब संप्रभुता मॉरीशस के पास है। अमेरिका और ब्रिटेन दोनों ही इस क्षेत्र में गतिविधियों को लेकर चिंतित हैं।

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मॉरीशस और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मॉरीशस के प्रधानमंत्री डॉ. नवीनचंद्र रामगुलाम का फोन आया, जिसमें दोनों नेताओं ने हिंद महासागर क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने और उन्नत रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा की।

डिएगो गार्सिया चागोस के लगभग 60 द्वीपों में से एक है और ब्रिटेन ने 1965 में इसे मॉरीशस से अलग कर अमेरिका को सैन्य बेस के लिए पट्टे पर दिया था। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने 2019 में ब्रिटेन के नियंत्रण को अवैध करार दिया और द्वीपसमूह मॉरीशस को लौटाने का आदेश दिया। अक्टूबर 2024 में ब्रिटेन ने इस पर सहमति जताई।

भारत मॉरीशस के EEZ (विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र) में जलवैज्ञानिक सर्वेक्षणों में सहयोग कर रहा है। इसके साथ ही मॉरीशस चागोस में अपना ध्वज फहराने के लिए भारतीय जहाज का उपयोग करेगा, जो ब्रिटेन को एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है।

विश्लेषकों के अनुसार, भारत का यह कदम न केवल मॉरीशस को समर्थन देने का प्रतीक है, बल्कि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता और ब्रिटेन की मौजूदगी पर नजर रखने में भी मदद करेगा। भारत पोर्ट लुइस के पुनर्निर्माण में भी मॉरीशस की सहायता करेगा।

मालदीव और अन्य देशों ने भी चागोस की संप्रभुता को लेकर ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते पर आपत्ति जताई है। भारत ने हमेशा मॉरीशस के उपनिवेशवाद-विरोधी प्रयासों का समर्थन किया है और अब इस रणनीतिक कदम से उसकी मौजूदगी और प्रभाव और मजबूत होगा।

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