Tuesday, February 10

धार्मिक शिक्षण संस्थानों के रजिस्ट्रेशन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देने वाले सभी शिक्षण संस्थानों के अनिवार्य पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह विषय न्यायालय से अधिक कार्यपालिका (सरकार) के अधिकार क्षेत्र में आता है और याचिकाकर्ता को पहले प्रशासनिक स्तर पर अपनी मांग रखनी चाहिए।

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यह मामला अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दाखिल याचिका से जुड़ा था, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि 14 वर्ष से कम बच्चों को शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया जाए।

पीठ ने दी याचिका वापस लेने की अनुमति

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत इस याचिका पर फिलहाल हस्तक्षेप नहीं करेगी। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह उचित प्रतिनिधित्व के साथ संबंधित अधिकारियों और सरकार के समक्ष यह मुद्दा उठा सकते हैं।

अदालत के आदेश में कहा गया कि याचिका को प्रतिनिधित्व देने की स्वतंत्रता के साथ वापस लिया जाता है।

याचिका में ‘ब्रेनवॉश’ और राष्ट्रीय सुरक्षा की जताई गई चिंता

याचिका में दलील दी गई थी कि छोटे बच्चे अनुभवहीन होते हैं और उन्हें धार्मिक शिक्षा के नाम पर प्रभावित कर ब्रेनवॉश किया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया और कहा कि बच्चों को अनिवार्य बुनियादी शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

याचिका में यह भी कहा गया कि यदि बच्चों को 6 से 14 वर्ष की आयु में अनिवार्य शिक्षा नहीं मिलती और उन्हें केवल धार्मिक शिक्षा में भेजा जाता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21A की भावना के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: बंगाल में रजिस्ट्रेशन जैसी बात नहीं

सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह समझना जरूरी है कि “रजिस्ट्रेशन” से याचिकाकर्ता का आशय क्या है। उन्होंने कहा कि कम से कम पश्चिम बंगाल में उन्हें रजिस्ट्रेशन जैसी कोई व्यवस्था दिखाई नहीं देती, क्योंकि वहां मदरसों के लिए अलग से मदरसा शिक्षा बोर्ड मौजूद है।

उन्होंने कहा कि बंगाल में हर मदरसे को बोर्ड के तहत मान्यता लेना जरूरी है, तभी वे छात्रों को कक्षाओं और परीक्षाओं में भेज सकते हैं।

अनुच्छेद 30 की व्याख्या पर भी उठे सवाल

याचिका में यह भी मांग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट यह घोषित करे कि संविधान का अनुच्छेद 30 धार्मिक शिक्षा के लिए नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष और व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों के लिए है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों को अनुच्छेद 30 के तहत संरक्षण देना संविधान की गलत व्याख्या है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि यह मामला पहले सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था के स्तर पर देखा जाना चाहिए। अदालत ने फिलहाल हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को कार्यपालिका के समक्ष प्रतिनिधित्व करने की सलाह दी।

इस फैसले को धार्मिक शिक्षा, बच्चों के अधिकार और संविधान की व्याख्या से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।

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