
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गाजा संकट को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक बार फिर तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर 19 फरवरी को वॉशिंगटन में प्रस्तावित ‘गाजा बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली औपचारिक बैठक होने जा रही है। हालांकि, इस अहम बैठक में भारत के शामिल होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।
इसके बावजूद, यह साफ है कि आने वाले दिनों में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि गाजा संकट के बीच इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ भारत के रिश्ते संतुलन की परीक्षा से गुजर रहे हैं।
भारत क्यों नहीं बन रहा बोर्ड ऑफ पीस का हिस्सा?
सूत्रों के अनुसार भारत सरकार अभी भी ट्रंप प्रशासन के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। लेकिन बैठक की तारीख नजदीक होने के कारण लगभग तय माना जा रहा है कि भारत फिलहाल इस मंच का हिस्सा नहीं बनेगा।
यह मुद्दा हाल ही में दिल्ली में हुई भारत-अरब लीग विदेश मंत्रियों की बैठक में भी उठ चुका है। उस बैठक में भारत ने अरब देशों की राय को गंभीरता से सुना, लेकिन अपनी रणनीति को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया।
भारत की पारंपरिक नीति: दो-राष्ट्र समाधान पर जोर
भारत लंबे समय से इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के समाधान के लिए ‘दो-राष्ट्र समाधान’ की वकालत करता रहा है। भारत ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि फिलिस्तीन और इजरायल दोनों को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अधिकार है।
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत-इजरायल संबंधों में ऐतिहासिक मजबूती आई है, जिससे भारत की विदेश नीति की चुनौती और बढ़ गई है।
पाकिस्तान और तुर्की की जुगलबंदी बनी भारत के लिए चुनौती
भारत की हिचकिचाहट के पीछे एक बड़ा कारण यह भी बताया जा रहा है कि इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पाकिस्तान और तुर्की की मजबूत मौजूदगी है।
सूत्रों का दावा है कि ट्रंप प्रशासन पहले भी पाकिस्तान को गाजा में फोर्स भेजने के लिए प्रोत्साहित कर चुका है। ऐसे में यदि पाकिस्तान और तुर्की इस मंच पर सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो भारत के लिए वहां अपनी रणनीति और संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी रुख अपनाते रहे हैं।
इसी महीने इजरायल जाएंगे प्रधानमंत्री मोदी
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक अहम संकेत यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी महीने के अंत तक इजरायल यात्रा पर जा सकते हैं। यह 2017 के बाद उनकी पहली इजरायल यात्रा होगी।
बताया जा रहा है कि पीएम मोदी के तेल अवीव और यरुशलम जाने की संभावना है। पश्चिम एशिया में तेजी से बदल रही भू-राजनीति के बीच यह दौरा भारत की रणनीति को लेकर निर्णायक माना जा रहा है।
नेतन्याहू की भी संभावित भागीदारी
कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी इस बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में शामिल हो सकते हैं।
यदि ऐसा होता है, तो यह अक्टूबर 2023 में हमास के हमले के बाद नेतन्याहू की अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं के साथ पहली संभावित बैठक होगी, जो कूटनीतिक दृष्टि से बेहद अहम मानी जाएगी।
भारत की रणनीति क्या हो सकती है?
भारत फिलहाल इस बैठक में सीधे शामिल न होकर एक संतुलित और सतर्क रणनीति अपना रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह:
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इजरायल के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे
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फिलिस्तीन के समर्थन की अपनी ऐतिहासिक नीति को कमजोर न होने दे
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पाकिस्तान-तुर्की गठजोड़ के बीच अपने राष्ट्रीय हित सुरक्षित रखे
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अरब देशों के साथ ऊर्जा और व्यापार संबंधों को मजबूत बनाए रखे
निष्कर्ष
गाजा संकट को लेकर ट्रंप की पहल भले ही अमेरिका की नई रणनीति का हिस्सा हो, लेकिन भारत इस मामले में जल्दबाजी करने के बजाय कूटनीतिक संतुलन और रणनीतिक चतुराई के साथ आगे बढ़ता दिख रहा है।
अब सबकी नजरें प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित इजरायल यात्रा पर टिकी हैं, क्योंकि इसी दौरे से भारत की पश्चिम एशिया नीति की दिशा और गाजा संकट पर उसकी भूमिका का संकेत मिल सकता है।
