
नई दिल्ली/कोलकाता। भारतीय राजनीति में कांग्रेस और वाम दलों (लेफ्ट) का रिश्ता हमेशा स्थायी और एक जैसा नहीं रहा। कभी यह संबंध वैचारिक समानता के आधार पर मजबूत माना गया, तो कभी राजनीतिक मजबूरी के चलते दोनों दलों को एक मंच पर आना पड़ा। लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों और लगातार कमजोर होते चुनावी प्रदर्शन ने अब इस रिश्ते में दरार पैदा कर दी है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस धीरे-धीरे लेफ्ट से दूरी बनाती नजर आ रही है और इसकी वजहें काफी अहम हैं।
गठबंधन रहा, लेकिन सफलता नहीं मिली
पश्चिम बंगाल में 2016 के बाद कांग्रेस और लेफ्ट के बीच गठबंधन सक्रिय रहा। उद्देश्य था ममता बनर्जी की टीएमसी और बीजेपी को चुनौती देना। लेकिन चुनावी परिणामों ने बार-बार साबित किया कि यह गठबंधन जमीन पर अपेक्षित असर नहीं डाल सका।
सबसे बड़ा उदाहरण 2021 विधानसभा चुनाव रहा, जब कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर 92 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुला। कांग्रेस का वोट शेयर भी सिमटकर करीब 3 प्रतिशत रह गया। यह सिर्फ हार नहीं थी, बल्कि कांग्रेस के संगठन और सामाजिक आधार के कमजोर होने का बड़ा संकेत था।
कांग्रेस के भीतर बढ़ा असमंजस
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह रही कि लेफ्ट के साथ गठबंधन करने के बावजूद उसे न तो सीटें मिलीं और न ही जनाधार बढ़ा। पार्टी नेतृत्व को लगने लगा कि लेफ्ट अब कांग्रेस के लिए राजनीतिक ताकत नहीं, बल्कि चुनावी नुकसान का कारण बन रहा है।
2019 लोकसभा चुनाव में दोनों दल अलग हुए, जबकि 2024 में फिर साथ आए। इन लगातार बदलते फैसलों ने कांग्रेस के भीतर रणनीतिक असमंजस को और बढ़ा दिया।
केरल में सीधी दुश्मनी, बंगाल में दोस्ती कैसे?
कांग्रेस और लेफ्ट के रिश्तों में सबसे बड़ा विरोधाभास केरल में देखने को मिलता है। वहां कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF और वाम मोर्चा सीधे आमने-सामने हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दलों के बीच सहजता अब खत्म होती जा रही है।
राहुल गांधी के खिलाफ वायनाड सीट से एनी राजा को मैदान में उतारना भी यह दिखाता है कि लेफ्ट और कांग्रेस के रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहे।
बीजेपी के हमले से कांग्रेस असहज
लेफ्ट के साथ गठबंधन को लेकर बीजेपी लगातार कांग्रेस पर हमला बोलती रही है। बीजेपी इसे “वैचारिक समझौते” और “अस्थिर गठबंधन” के रूप में प्रचारित करती रही है। इससे कांग्रेस के लिए वैचारिक असहजता बढ़ी और पार्टी को यह लगने लगा कि लेफ्ट के साथ रहना उसकी छवि और राजनीतिक विस्तार में बाधा बन रहा है।
कांग्रेस की नई रणनीति: अकेले लड़कर खुद को स्थापित करना
अब कांग्रेस पश्चिम बंगाल में यह संकेत दे रही है कि वह ममता बनर्जी के खिलाफ अकेले उतरकर खुद की राजनीतिक पहचान दोबारा बनाना चाहती है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि उसका पारंपरिक वोट बैंक लेफ्ट के सहारे नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र रणनीति और संगठन के जरिए वापस हासिल किया जा सकता है।
कांग्रेस का यह रुख बताता है कि पार्टी अब सहयोगियों की छाया में नहीं, बल्कि अपनी जमीन खुद तैयार करने की कोशिश में है।
लेफ्ट के लिए बढ़ सकता है संकट
कांग्रेस की यह दूरी लेफ्ट के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है। पश्चिम बंगाल में पहले ही कमजोर हो चुके वाम दलों के सामने अस्तित्व का संकट और गहरा सकता है। यदि कांग्रेस ने साथ छोड़ दिया, तो लेफ्ट के लिए चुनावी राजनीति में खुद को बचाए रखना और मुश्किल हो जाएगा।
निष्कर्ष: पुराने गठबंधन टूट रहे, नई राजनीति बन रही
यह सिर्फ गठबंधन टूटने की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति में बदलते दौर का संकेत है। कांग्रेस अब लेफ्ट को साझेदार की बजाय राजनीतिक अतीत मानने लगी है। पार्टी को लग रहा है कि लेफ्ट के साथ रहकर वह न तो सत्ता का विकल्प बन सकती है और न ही बीजेपी के खिलाफ प्रभावी चुनौती।
कुल मिलाकर, बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट के रिश्तों में बढ़ती दूरी इस बात का संकेत है कि देश की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां पुराने गठबंधन टूट रहे हैं और दल अपनी अलग पहचान बनाने की लड़ाई में जुट गए हैं।
