
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका, रूस और चीन को शामिल करने वाली नई परमाणु हथियार नियंत्रण संधि की पेशकश की है। यह कदम न्यू स्टार्ट संधि के 5 फरवरी 2026 को समाप्त होने के बाद उठाया गया। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि केवल अमेरिका और रूस के बीच हथियार नियंत्रण पर्याप्त नहीं है, क्योंकि चीन लगातार अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ा रहा है।
अमेरिका की चिंता
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि हथियारों पर नियंत्रण अब केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रह सकता। अन्य परमाणु-सशस्त्र देशों की रणनीतिक स्थिरता भी सुनिश्चित करनी होगी। उनका आरोप है कि चीन तेजी से और गुप्त तरीके से अपने परमाणु भंडार का विस्तार कर रहा है।
अमेरिका की नई योजना के अनुसार—
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चीन को भी वार्ता में शामिल किया जाना चाहिए
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तीन-तरफा संधि से परमाणु हथियारों की नई सीमाएं तय की जा सकती हैं
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इससे वैश्विक सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी
चीन ने किया इनकार
रूस और अमेरिका की न्यू स्टार्ट संधि समाप्त होने के अगले ही दिन चीन ने स्पष्ट किया कि वह इस समय किसी भी नई निरस्त्रीकरण वार्ता में शामिल नहीं होगा। चीन के राजदूत शेन जियान ने वॉशिंगटन के आरोपों को गैर-जिम्मेदाराना बताया। उन्होंने कहा, “चीन फिलहाल परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता में हिस्सा नहीं लेगा। जिन देशों के पास सबसे बड़े परमाणु भंडार हैं, उन्हें अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।”
चीन पर अमेरिका का आरोप
अमेरिकी विदेश उप सचिव थॉमस डिनानो ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के निरस्त्रीकरण सम्मेलन में चीन पर आरोप लगाया कि—
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चीन अपने परमाणु जखीरे का विस्तार कर रहा है
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साल 2030 तक चीन 1,000 परमाणु हथियार बना सकता है
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चीन गुप्त तरीके से परमाणु परीक्षण कर रहा है, जिसमें बड़े पैमाने के विस्फोट शामिल हैं
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परीक्षणों को छिपाने और अस्पष्ट करने की कोशिश की जाती है
वैश्विक सुरक्षा पर असर
विश्लेषकों का कहना है कि रूस और अमेरिका अब भी दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत परमाणु हथियारों का नियंत्रण करते हैं। हालांकि, चीन की तेजी से बढ़ती परमाणु शक्ति इस संतुलन को चुनौती दे रही है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, चीन ने 2023 से हर वर्ष लगभग 100 नए परमाणु हथियार बनाने शुरू कर दिए हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर चीन अपनी इस नीति को जारी रखता है और अमेरिका-रूस की नई संधि में शामिल नहीं होता, तो वैश्विक परमाणु संतुलन और रणनीतिक स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।