Saturday, February 7

नाबालिग को मां बनने पर मजबूर नहीं किया जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते की गर्भावस्था का टर्मिनेशन मंजूर किया

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 30 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग लड़की को गर्भपात की अनुमति दे दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने जोर देकर कहा कि गर्भवती लड़की की प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) का सम्मान किया जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी महिला, खासकर नाबालिग, को उसकी मर्जी के बिना मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें:

  • नाबालिग का गर्भावस्था जारी न रखने का अधिकार सर्वोपरि है।

  • अदालत ने कहा कि इस मामले में गर्भावस्था अवैध (Illegitimate) मानी जाती है क्योंकि लड़की नाबालिग है और परिस्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है।

  • बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुद्दा सहमति या यौन उत्पीड़न का नहीं है; अंतिम तथ्य यह है कि गर्भावस्था नाबालिग होने के कारण अवैध है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल को निर्देश दिया कि मेडिकल ऐहतियात का पालन करते हुए गर्भावस्था का सुरक्षित टर्मिनेशन करें।

मौजूदा कानून और SC के पहले के फैसले:

  • 2021 में केंद्र सरकार ने प्रेग्नेंसी खत्म करने की मियाद 20 से बढ़ाकर 24 हफ्ते की। विशेष कैटेगरी की महिलाओं (रेप विक्टिम, विवाह स्थिति बदलने की स्थिति आदि) को 24 हफ्ते तक प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की अनुमति दी गई।

  • सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में कहा था कि अविवाहित महिलाओं को भी MTP ऐक्ट के तहत गर्भपात का अधिकार है। अब तक 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी तक ही गर्भपात की इजाजत थी।

30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी पर फैसला क्यों महत्वपूर्ण है:

  • सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते तक की गर्भावस्था को भी टर्मिनेशन की अनुमति दी, जब नाबालिग ने स्पष्ट रूप से गर्भावस्था जारी न रखने की इच्छा जताई।

  • अदालत ने कहा कि नाबालिग को मां बनने के लिए मजबूर करना संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।

  • यह फैसला प्रजनन अधिकारों और महिलाओं की स्वायत्तता की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।

निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल नाबालिगों के अधिकारों को सशक्त करता है, बल्कि महिलाओं के शरीर पर उनकी स्वायत्तता और प्रजनन अधिकारों की मान्यता को भी मजबूत करता है। अब कोई भी नाबालिग या महिला उसकी मर्जी के बिना मां बनने के लिए बाध्य नहीं की जा सकती।

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