Saturday, February 7

तमाम चुनौतियों से टकराते हुए भी मजबूत है भारतीय संविधान, धर्म-जाति की राजनीति से खतरा

नई दिल्ली: भारत के लिए गर्व की बात है कि हमारा लोकतंत्र और संविधान आज भी सुरक्षित है। स्वतंत्रता के ढाई वर्षों में ही भारत ने गणतंत्र का रूप धारण कर लिया, जबकि पाकिस्तान 23 मार्च 1956 को गणतंत्र बना और उसके लोकतंत्र का हाल लगातार संकटग्रस्त रहा। कई अन्य देशों के उदाहरणों से भी यह स्पष्ट होता है कि भारत ने किस हद तक लोकतंत्र और संविधान की मजबूती बनाए रखी है।

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संविधान की कसौटी:
ग्रैंविल ऑस्टिन के अनुसार, किसी संविधान की सफलता इस बात से मापी जाती है कि वह उन परिस्थितियों से कितनी कुशलता से निपट सकता है, जिन्हें ध्यान में रखकर उसे बनाया गया। भारतीय संविधान इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण इसका जीवंत प्रमाण है।

आलोचकों को मिला जवाब:
प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री आइवर जेनिंग्स ने पहले भारत के संविधान को कमजोर बताते हुए भविष्यवाणी की थी कि यह जल्द ही ध्वस्त हो जाएगा। लेकिन उनके अनुसार ही श्रीलंका में लिखे गए संविधान की छह साल में समाप्ति हो गई, जबकि भारतीय संविधान आज भी जीवंत और सफल है।

जातिवाद और सांप्रदायिक राजनीति का खतरा:
आज देश में जाति और धर्म की राजनीति विचारधारात्मक समर्थन पा रही है। आगामी जातीय जनगणना और राजनीतिक अभियानों ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। नेहरू ने 1953 में मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में चेताया था कि प्रांतीय, जातीय और भाषाई भावनाओं को राष्ट्रीय भावना के अधीन होना चाहिए। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी 1960 में स्वतंत्रता दिवस पर इस बात पर जोर दिया।

सावधानी और सुधार के मुद्दे:

  • चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद जारी है। विपक्ष का आरोप है कि इसे मतदाता सूची से विरोधियों को बाहर करने के लिए किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन पहचान के लिए कुछ अन्य दस्तावेज़ों को शामिल करने का निर्देश दिया।

  • भ्रष्टाचार, भारत के लिए हमेशा बड़ी चुनौती रहा है। 1946 में महात्मा गांधी को प्रतिदिन लगभग 80 शिकायतें मिलती थीं। नेहरू ने इसे ‘लिटिल करप्शन’ बताया, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ा और आज यह सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

  • मिली-जुली सरकारों ने संविधानिक संस्थानों को मजबूत किया है, जबकि एकदलीय सरकारें संस्थाओं और कैबिनेट सिस्टम को कमजोर कर सकती हैं।

विशेष निष्कर्ष:
भारतीय संविधान तमाम उतार-चढ़ावों, राजनीतिक दबावों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद आज भी जीवंत और मजबूत है। हालांकि, धर्म, जाति और भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियों से सतर्क रहना आवश्यक है ताकि लोकतंत्र और संविधान की मजबूती बनी रहे।

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